अरे वाह! ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका ने क्या अद्भुत खोज की है! उन्होंने बड़ी गंभीरता से फरमाया है कि भारत में विरोध प्रदर्शन का अधिकार सरकार की दया या अनुमति पर निर्भर नहीं होना चाहिए। मतलब हद है भाई! अब क्या जनता सरकार के खिलाफ बिना पर्ची कटवाए, बिना ‘कमीशन’ दिए और बिना सरकारी थप्पे के गुस्सा भी जाहिर करेगी? यह तो सीधे-सीधे हमारी उस महान प्रशासनिक परंपरा का अपमान है, जहां छींकने के लिए भी तीन प्रतियों में आवेदन जमा करना पड़ता है!
लोकतंत्र का नया फॉर्मूला: ‘अनुमति वाला आक्रोश’
हमारे देश में गृह मंत्रालय और स्थानीय प्रशासन का मानना है कि नागरिकों का गुस्सा हमेशा ‘अनुशासित’ और ‘नियम अनुसार’ होना चाहिए। मान लीजिए, आपको सरकार की किसी नीति से भारी तकलीफ है और आपका खून खौल रहा है। तो हमारी व्यवस्था का नियम क्या कहता है? पहले आप एक सुंदर सा आवेदन पत्र लिखिए। उसमें नम्रता से लिखिए— ‘सेवा में, परम आदरणीय सरकार बहादुर, हमें आपकी नीतियों से बहुत पेट दर्द है, इसलिए कृपया हमें आपके ही खिलाफ नारेबाजी करने के लिए मंगलवार को दोपहर 2 से 3 बजे का स्लॉट देने की कृपा करें।’
फिर प्रशासन आपके इस आवेदन को चार फाइलों में घुमाएगा। इंटेलिजेंस ब्यूरो आपकी सात पीढ़ियों का इतिहास खंगालेगा कि कहीं आपकी परदादी ने 1942 में सरकारी नल से बिना इजाजत पानी तो नहीं भरा था? अगर सब ठीक रहा, तो आपको विरोध करने की ‘सशर्त’ अनुमति मिल जाएगी— शर्त यह होगी कि आप रविवार को तड़पे 4 बजे, शहर से 50 किलोमीटर दूर किसी सुनसान मैदान में जाकर चुपचाप तख्ती दिखाएंगे, ताकि किसी मंत्री जी की नींद में खलल न पड़े!
जंतर-मंतर की सीमाएं और वॉटर कैनन का ‘वात्सल्य’
अगर कोई सिरफिरा नागरिक बिना इजाजत सड़क पर उतर आया, तो हमारे पुलिस विभाग का ‘अतिथि देवो भव:’ तुरंत जाग उठता है। वॉटर कैनन से ठंडे पानी की फुहारें मारकर जनता के गर्म खून को शांत किया जाता है। आखिर सरकार का फर्ज है कि वह अपने नागरिकों को डिहाइड्रेशन और हाई बीपी से बचाए! सत्ता पक्ष का तो साफ मानना है कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन केवल ‘जंतर-मंतर’ के 100 मीटर के दायरे में ही होना चाहिए, ताकि टीआरपी वाले चैनलों को बैकग्राउंड म्यूजिक मिल सके और सरकार आराम से फाइलें निपटा सके।
अगर जनता को सरकार से ही पूछकर सरकार का विरोध करना पड़े, तो वह दिन दूर नहीं जब धरने पर बैठने के लिए भी मोबाइल पर आधार-लिंक्ड OTP आएगा। OTP दर्ज कीजिए और 15 मिनट के लिए ‘संवैधानिक रूप से स्वीकृत’ आक्रोश व्यक्त कीजिए!
खैर, ‘काक-वाणी’ का तो यही परामर्श है कि अगली बार जब आपको देश के हालात पर गुस्सा आए, तो सबसे पहले अपने नजदीकी थाने से ‘आक्रोश का टोकन’ ले लें। बिना टोकन का गुस्सा सीधे-सीधे ट्रैफिक जाम और देशद्रोह की श्रेणी में आता है, यह बात अपने दिमाग में अच्छे से बिठा लीजिए!
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