आजकल भारतीय सिनेमा के पर्दे पर अगर नायक को अपनी ‘मर्दानगी’ साबित करनी हो, तो उसे कम से कम दस गुंडों की हड्डियां तोड़नी पड़ती हैं, जोर-जोर से चिल्लाना पड़ता है और अपने गुस्से से स्क्रीन को लाल करना पड़ता है। ‘एनिमल’ और ‘कबीर सिंह’ जैसी फिल्मों की भारी सफलता ने सिनेमा में ‘हाइपरमैस्कुलिनिटी’ यानी अति-मर्दानगी के एक नए दौर को जन्म दिया है। लेकिन, इस बहती गंगा में भी कुछ ऐसे सितारे हैं जो अपनी सहजता और संवेदनशीलता को खोना नहीं चाहते। इन्हीं में से एक हैं वर्सटाइल अभिनेता सिद्धार्थ।
शोर-शराबे के बीच सिद्धार्थ की ‘शांत’ दहाड़
हाल ही में एक इंटरव्यू में सिद्धार्थ ने इस उभरते ट्रेंड पर अपनी बेबाक राय रखी। सिद्धार्थ ने साफ कहा कि भले ही आजकल स्क्रीन पर दहाड़ने वाले और हिंसक किरदारों का बोलबाला हो, लेकिन उनके तरह की ‘मर्दानगी’ के लिए दर्शकों के दिलों में हमेशा एक खास जगह बनी रहेगी। उनका मानना है कि मर्द होने का मतलब सिर्फ हिंसा या गुस्सा दिखाना नहीं है।
सिद्धार्थ ने कहा, “सिनेमा में हर तरह की कहानियों और किरदारों के लिए जगह होती है। अगर आज हाइपरमैस्कुलिनिटी चल रही है, तो इसका मतलब यह नहीं कि संवेदनशीलता खत्म हो गई है। मेरी तरह की मर्दानगी—जो संवेदनशील है, जो महिलाओं का सम्मान करती है और जो अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करती है—उसका अस्तित्व हमेशा रहेगा।”
क्या दर्शक केवल ‘अल्फा मेल’ ही देखना चाहते हैं?
सिद्धार्थ का यह बयान ऐसे समय आया है जब फिल्म क्रिटिक्स लगातार इस बात पर बहस कर रहे हैं कि क्या बॉलीवुड और साउथ सिनेमा केवल ‘अल्फा मेल’ किरदारों के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है? ‘काक-वाणी’ के विश्लेषकों की मानें तो सिद्धार्थ की यह बात बिल्कुल सच है। दर्शक भले ही थिएटर में कुछ समय के लिए एक्शन और चीख-पुकार का मजा ले लें, लेकिन अंत में वे उन्हीं किरदारों से जुड़ाव महसूस करते हैं जो उनके जैसे सच्चे और संवेदनशील होते हैं।
‘चिट्ठा’ फिल्म से पेश किया था बड़ा उदाहरण
सिद्धार्थ ने अपनी हालिया हिट फिल्म ‘चिट्ठा’ (Chithha) का उदाहरण भी दिया, जिसमें उन्होंने एक ऐसे पुरुष का किरदार निभाया था जो अपनी भतीजी की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, लेकिन उसके अंदर एक कोमलता और दर्द भी है। यही तो असली मर्दानगी है, जिसे देखकर दर्शक रोए भी और खड़े होकर तालियां भी बजाईं।
तो दोस्तों, सिद्धार्थ की इस बात से आप कितने सहमत हैं? क्या सिनेमा को अब ‘थप्पड़ मारने वाले’ नायकों के बजाय ‘हाथ थामने वाले’ और संवेदनशील नायकों की ज्यादा जरूरत है? अपनी राय हमें जरूर बताएं!
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