एक समृद्ध सेठ और उसकी अंतहीन तृष्णा
बहुत समय पहले की बात है, एक समृद्ध नगर में धर्मदास नाम का एक बेहद अमीर व्यापारी रहता था। उसके पास धन, दौलत, महल और नौकर-चाकर, सब कुछ था। लेकिन इस सबके बावजूद उसके मन में कभी शांति नहीं थी। उसे हर पल यही चिंता सताती रहती थी कि उसकी मृत्यु के बाद इस असीम धन-दौलत का क्या होगा। वह अक्सर सोचता कि क्या कोई ऐसा तरीका नहीं है जिससे वह अपनी सारी संपत्ति को मृत्यु के बाद भी अपने साथ परलोक ले जा सके। उसका यह लालच उसे रात भर सोने नहीं देता था।
एक फकीर का आगमन और अनोखी शर्त
एक दिन नगर में एक पहुंचे हुए फकीर का आगमन हुआ। वे अपनी कुटिया में शांत भाव से ईश्वर की भक्ति में लीन रहते थे। धर्मदास अपनी समस्या लेकर उनके पास पहुंचा और रोते हुए बोला, “हे महात्मा! मेरे पास अपार धन है, पर मुझे डर है कि मौत के बाद मैं इसे खो दूंगा। क्या आप मुझे कोई ऐसा उपाय बता सकते हैं जिससे मैं अपनी दौलत को अपने साथ अगले जन्म में ले जा सकूं?”
फकीर ने धर्मदास की आंखों में छिपी व्याकुलता और लालच को भांप लिया। वे धीमे से मुस्कुराए और अपनी झोली से एक छोटी सी सोने की सुई निकाली। उन्होंने वह सुई धर्मदास के हाथ में रख दी और बोले, “यह सुई बहुत कीमती है। तुम इसे संभालकर अपने पास रखो। जब तुम्हारी मृत्यु हो और तुम परलोक जाओ, तो वहां मुझे ढूंढकर यह सुई मुझे वापस लौटा देना। बस, यही मेरा तुमसे अनुरोध है।”
सत्य का बोध और फूट-फूटकर रोना
धर्मदास सुई पाकर बहुत खुश हुआ। उसने सोचा कि यदि वह इस सुई को स्वर्ग ले जा सकता है, तो धीरे-धीरे अपनी बाकी दौलत भी ले जाने का रास्ता ढूंढ लेगा। वह सुई लेकर अपने महल आ गया। लेकिन रात को जब वह बिस्तर पर लेटा, तो अचानक उसके मन में एक गहरा विचार आया, “जब मृत्यु के बाद इस नश्वर शरीर के वस्त्र भी यहीं छूट जाते हैं, तो मैं इस सुई को परलोक कैसे ले जाऊंगा? जब प्राण निकलेंगे, तो मुट्ठियां तो अपने आप खुल जाएंगी।”
यह सोचते ही उसका सिर चकराने लगा और उसकी आत्मा कांप उठी। उसे अपनी अज्ञानता का अहसास हुआ। अगली सुबह वह दौड़ता हुआ फकीर के पास गया और उनके चरणों में गिरकर फूट-फूटकर रोने लगा। उसने कांपते हाथों से सुई वापस करते हुए कहा, “महाराज, मुझे क्षमा करें। मैं इस नन्हीं सी सुई को भी मृत्यु के पार नहीं ले जा सकता। मौत के द्वार पर तो सिकंदर जैसा सम्राट भी खाली हाथ ही गया था।”
जीवन का असली सत्य
फकीर ने अत्यंत प्रेमपूर्वक धर्मदास को गले से लगाया और कहा, “मेरे बच्चे, यही तो जीवन का अंतिम सच है। जब तुम जानते हो कि तुम एक छोटी सी सुई भी अपने साथ नहीं ले जा सकते, तो फिर इस धन के लिए इतना मोह, अहंकार और दूसरों का हक मारना क्यों? जो यहीं रह जाना है, उसे बटोरने में अपनी आत्मा को मैला मत करो।”
धर्मदास की आंखों से बहते आंसुओं ने उसके मन की सारी मैल धो दी थी। उसने उसी दिन से अपना जीवन बदल लिया और अपनी तिजोरियों के द्वार गरीबों, अनाथों और बीमारों की सेवा के लिए खोल दिए।
कहानी की सीख
यह जीवन का सच बताने वाली लोककथा हमें यह अनमोल सीख देती है कि इस संसार में हम जो कुछ भी भौतिक रूप से कमाते हैं, वह यहीं छूट जाता है। इंसान का असली धन उसका धन-दौलत नहीं, बल्कि उसके द्वारा किए गए अच्छे कर्म, परोपकार और दूसरों के चेहरे पर लाई गई मुस्कान है। मृत्यु के बाद केवल हमारे कर्म ही हमारा साथ देते हैं।