माया का जाल और एक बेचैन मन
बहुत समय पहले की बात है, एक समृद्ध नगर में धर्मदत्त नाम का एक बेहद अमीर व्यापारी रहता था। उसके पास आलीशान महल, नौकर-चाकर और इतनी धन-दौलत थी कि उसकी आने वाली सात पीढ़ियां भी आराम से बैठ कर खा सकती थीं। लेकिन इस अपार संपत्ति के बावजूद धर्मदत्त के मन में कभी शांति नहीं थी। वह हर समय अपनी तिजोरी को और भरने की चिंता में डूबा रहता था। उसे लगता था कि उसका धन ही उसकी असली ताकत है और वह इसे अपनी तिजोरी में बंद करके अमर हो जाना चाहता था।
फकीर की अनोखी वसीयत
एक दिन नगर में एक परम तेजस्वी फकीर का आगमन हुआ। उनके चेहरे पर एक अलौकिक तेज और परम संतोष था। धर्मदत्त भी अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने के लिए कीमती उपहार लेकर फकीर के पास पहुंचा। फकीर ने उन उपहारों की तरफ देखा तक नहीं। उन्होंने अपनी झोली से एक साधारण सी लोहे की सुई निकाली और धर्मदत्त के हाथ पर रख दी।
फकीर ने बड़े शांत स्वर में कहा, “सेठ जी, मैं एक साधारण फकीर हूँ। मेरी एक प्रार्थना स्वीकार कीजिए। इस सुई को आप अपने पास संभाल कर रख लें। जब आपकी मृत्यु होगी और आप परलोक जाएंगे, तो वहाँ मुझे यह सुई वापस लौटा दीजिएगा।”
जब टूटा भ्रम का महल
धर्मदत्त ने सुई ले ली और अपने महल लौट आया। लेकिन घर लौटते ही उसका सिर घूमने लगा। वह रात भर सो नहीं पाया। वह सोचने लगा, “यह कैसे संभव है? मृत्यु के बाद तो यह नश्वर शरीर यहीं मिट्टी में मिल जाता है। कफन में तो जेब भी नहीं होती। फिर मैं परलोक में इस सुई को कैसे लेकर जाऊंगा?” यह विचार उसके दिमाग में इस कदर घर कर गया कि उसकी व्याकुलता बढ़ती ही चली गई।
आखिरकार, बेचैन होकर वह सुबह होते ही दोबारा फकीर के पास दौड़ा गया। उसने सुई फकीर के चरणों में रख दी और रुआंसे स्वर में बोला, “महात्मन! मुझे क्षमा करें। मैं आपकी यह सुई परलोक नहीं ले जा सकता। मौत के बाद इंसान खाली हाथ जाता है, वह सुई जैसी मामूली चीज भी अपने साथ नहीं ले जा सकता।”
जीवन का शाश्वत सच
फकीर मंद-मंद मुस्कुराए और उन्होंने धर्मदत्त के कंधे पर हाथ रखा। उन्होंने बेहद करुणामयी आवाज में कहा, “हे धर्मदत्त! जब तुम जानते हो कि तुम परलोक में एक छोटी सी सुई भी साथ नहीं ले जा सकते, तो फिर इस सोने-चांदी, जमीन और हवेलियों को इकट्ठा करने के लिए जीवन भर छल और अधर्म क्यों करते रहे? जब अंत में खाली हाथ ही जाना है, तो इस झूठी माया का इतना अहंकार क्यों?”
फकीर की यह बात सीधे धर्मदत्त के दिल में उतर गई। उसकी आँखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। उसका अहंकार टूटकर बिखर चुका था। उसे समझ आ गया कि जीवन का असली सच धन का संग्रह नहीं, बल्कि परोपकार और प्रेम है। उस दिन के बाद सेठ ने अपना जीवन बदल दिया और अपनी संपत्ति को गरीबों की भलाई में लगा दिया।
कहानी से सीख (Moral)
सीख: यह जीवन का सच बताने वाली लोककथा हमें सिखाती है कि संसार की कोई भी भौतिक वस्तु स्थायी नहीं है। मृत्यु के समय हमारी धन-दौलत यहीं धरी की धरी रह जाती है। केवल हमारे द्वारा किए गए अच्छे कर्म, दूसरों की मदद और बांटी गई खुशियां ही हमारे साथ जाती हैं।