अरे भाई साहब! अगर आपने हाल ही में ‘द वायर’ का वह ऐतिहासिक विश्लेषण नहीं पढ़ा, जिसमें बताया गया है कि कैसे पिछले सौ दिनों ने भारत के ‘पॉलिटिकल मैट्रिक्स’ को हिलाकर, मरोड़कर, बिल्कुल नया आकार दे दिया है, तो समझो आप अभी भी राजनीतिक रूप से आदिमानव काल में जी रहे हैं। धन्य हैं वे बुद्धिजीवी जो दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठकर देश का ‘मैट्रिक्स’ बदलते हुए देख लेते हैं, जबकि आम जनता अभी भी सड़कों के गड्ढों में अपना ‘लाइफ मैट्रिक्स’ ढूंढ रही है।
क्या सचमुच बदल गया ‘मैट्रिक्स’ या सिर्फ चश्मे का नंबर बदला?
इस महान क्रांतिकारी विश्लेषण के अनुसार, इन सौ दिनों में ऐसा चमत्कार हुआ है कि देश की राजनीति पूरी तरह बदल गई है। सरकार अब ‘अहंकार’ से ‘समझौते’ की ओर बढ़ रही है और विपक्ष ‘कोमा’ से सीधे ‘सुपरमैन मोड’ में आ गया है। वाह! क्या अद्भुत रूपांतरण है। अब संसद में पहले की तरह सिर्फ ‘एकतरफा’ फैसले नहीं होते, बल्कि अब ‘दोनों तरफ’ से केवल शोर मचता है। इसे ही तो असली लोकतंत्र और बदला हुआ मैट्रिक्स कहते हैं! पहले सरकार विपक्ष की नहीं सुनती थी, अब विपक्ष सरकार को सुनने नहीं देता। बदलाव साफ है, बस देखने के लिए दार्शनिक चश्मे की जरूरत है।
गठबंधन की मजबूरी या फेविकोल का नया विज्ञापन?
विपक्ष और मोदी सरकार के इस नए समीकरण में सबसे मजेदार बात यह है कि बैसाखियों को अब ‘डिजाइनर वॉकिंग स्टिक’ की तरह पेश किया जा रहा है। नीतीश बाबू और नायडू जी अब भारतीय संविधान के नए ‘रक्षक’ घोषित हो चुके हैं। ‘द वायर’ के अनुसार, इस मैट्रिक्स बदलाव ने सरकार को झुका दिया है। लेकिन सच तो यह है कि सरकार सिर्फ उतनी ही झुकी है, जितनी यू-टर्न लेते समय गाड़ी झुकती है। नीतियां वही हैं, जांच एजेंसियों के छापे वही हैं, बस अब फाइलों पर दस्तखत करने से पहले सहयोगियों के साथ दो कप चाय ज्यादा पीनी पड़ती है। क्या इसी को ‘सिस्टम रीबूट’ कहते हैं?
काक-वाणी का अंतिम निष्कर्ष
काक-वाणी का स्पष्ट मानना है कि भारत का राजनीतिक मैट्रिक्स दरअसल एक ‘सर्कस’ है। यहाँ रिंगमास्टर बदल सकते हैं, जोकर थोड़े और गंभीर दिख सकते हैं, और दर्शक दीर्घा में बैठी जनता की तालियां और गालियां बदल सकती हैं, लेकिन तंबू वही रहता है। सौ दिन बीत गए, अगले हजार दिन भी बीत जाएंगे। जनता उसी मैट्रिक्स में जीती रहेगी जहाँ टैक्स देना निश्चित है और टमाटर के दाम अनिश्चित। इसलिए, हे बुद्धिजीवियों! मैट्रिक्स बदलने की खुशफहमी का जश्न मनाते रहिए, क्योंकि हकीकत का बटन दबाते ही केवल ‘एरर 404’ ही नजर आएगा!
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