बधाई हो, देश के राजनीतिशास्त्रियों और इतिहास के प्रेमियों! आखिरकार मीडिया ने भी मान लिया कि हमारे लालकृष्ण आडवाणी जी सौ साल के हो रहे हैं। एक ऐसा जीवन, जो सेवा, विचारधारा और राष्ट्र-निर्माण को समर्पित रहा। लेकिन ‘काक-वाणी’ की कौवा-दृष्टि को तो इस पूरे जश्न के पीछे छिपी वह महीन पटकथा भी साफ दिखाई दे रही है, जिसे भारतीय राजनीति का सबसे सफल और मूक नाटक कहा जाता है।
रथ यात्रा से ‘मार्गदर्शक’ यात्रा तक
आडवाणी जी वही महान रथ-सारथी हैं, जिन्होंने कभी अयोध्या के नाम पर एक ऐसा ‘रथ’ दौड़ाया था, जिसकी उड़ाई हुई धूल आज तक भारतीय राजनीति के आसमान पर छाई हुई है। उसी रथ के पहियों की बदौलत ही पार्टी दो सीटों के मामूली आंकड़े से उठकर आज सत्ता के अखंड शिखर पर विराजमान है। लेकिन भारतीय राजनीति का दस्तूर भी कितना क्रूर है! जिन्होंने महल की नींव की ईंटें अपने हाथों से बिछाईं, उन्हें ही बाद में ‘मार्गदर्शक मंडल’ नामक एक ऐसे आलीशान संग्रहालय में सजा दिया गया, जहाँ मार्गदर्शन माँगने आज तक कोई भूलकर भी नहीं गया।
भारत रत्न: सर्वोच्च सम्मान या ‘रिटायरमेंट बोनस’?
जब आडवाणी जी को ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया, तो कई राजनीतिक पंडितों ने इसे ‘देर से लिया गया सही फैसला’ बताया। लेकिन ‘काक-वाणी’ इसे भारतीय राजनीति का सर्वोच्च ‘रिटायरमेंट बोनस’ मानती है। यह वह सम्मान है, जो बहुत प्यार से यह संदेश देता है कि “आप वाकई महान थे, आपने देश और पार्टी बनाई, अब कृपया घर के बरामदे में बैठकर टीवी पर हमारा नया राष्ट्र-निर्माण देखिए।”
जिस शिष्य को कभी आडवाणी जी ने उंगली पकड़कर राजनीति के अखाड़े में चलना सिखाया था, आज उसी के हाथों यह सर्वोच्च सम्मान ग्रहण करते वक्त आडवाणी जी की आँखों का सन्नाटा बहुत कुछ कह जाता है। यह सन्नाटा हर उस बुजुर्ग की त्रासदी बयां करता है, जिसे राजनीति की भाषा में ‘पीढ़ीगत परिवर्तन’ का नाम देकर किनारे लगा दिया जाता है।
आडवाणी जी का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ा सबक है—बीज कोई और बोता है, फसल कोई और काटता है, और मंडी में थैली पर फोटो किसी तीसरे की छपती है। फिर भी, सौवें साल में कदम रखते इस ‘लौह पुरुष’ को ‘काक-वाणी’ का साष्टांग प्रणाम! ईश्वर उन्हें दीर्घायु करे, ताकि वे यह चुपचाप देख सकें कि उनके बनाए रथ पर सवार होकर नए ड्राइवर गाड़ियां कहाँ-कहाँ ठोक रहे हैं।
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