हसीना जी का ‘गेस्ट अपीयरेंस’ और भारत-बांग्लादेश का कूटनीतिक ‘डेडलॉक’

स्वागत है कूटनीति के रसिकों! आज ‘काक-वाणी’ की पैनी नजर उस अंतरराष्ट्रीय त्रिकोण पर है, जिसे देखकर बड़े-बड़े आशिकों के सिर घूम जाएं। जी हां, हम बात कर रहे हैं भारत, बांग्लादेश और दिल्ली के किसी सुरक्षित ठिकाने पर चाय की चुस्कियां लेतीं शेख हसीना जी की। विश्वप्रसिद्ध चैनल अल जजीरा आजकल बेहद चिंतित है। उनका माथा इस बात पर ठनका है कि भारत और बांग्लादेश के बीच का ‘गतिरोध’ आखिर कैसे टूटेगा? अरे भाई, जब तक वीआईपी मेहमान घर के सोफे पर पैर पसारकर बैठा हो, तब तक पड़ोसी से ‘रिश्ते का रीसेट’ कैसे हो सकता है?

मेहमान जो जाने का नाम न ले, पड़ोसी जो चैन से जीने न दे

भारतीय संस्कृति में सदियों से सिखाया गया है—‘अतिथि देवो भव:’। अब अतिथि अगर अचानक बख्तरबंद गाड़ी और हेलिकॉप्टर लेकर सीधे आपके आंगन में लैंड कर जाए, तो आप उसे ‘गेट आउट’ तो कह नहीं सकते। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार रोज सुबह उठकर कसम खाती है कि वह हसीना जी को वापस बुलाकर ही दम लेगी। उधर, भारत ठहरा पुरानी यादों में जीने वाला भावुक पड़ोसी। हम कूटनीति से ज्यादा ‘याराना’ निभाते हैं। अब हसीना जी को वापस भेजना मतलब पुरानी दोस्ती के सीने में खंजर घोंपना, और न भेजना मतलब नए ढाका दरबार के गुस्से का सामना करना। इसे कहते हैं कूटनीति का धर्मसंकट!

गतिरोध तोड़ने का ‘काक-मार्का’ फॉर्मूला

अल जजीरा इस गतिरोध को सुलझाने के लिए बड़ी-बड़ी कूटनीतिक थ्योरी पेश कर रहा है, लेकिन ‘काक-वाणी’ के पास इसका बेहद सरल और व्यावहारिक समाधान है:

  • पहला उपाय: हसीना जी को कूटनीतिक रूप से ‘अदृश्य’ घोषित कर दिया जाए। वह भारत में रहें भी और न भी रहें—जैसे भारतीय सड़कों पर सरकारी गड्ढे होते हैं, जो दिखते तो हैं पर कागजों पर गायब रहते हैं।
  • दूसरा उपाय: ढाका के नए मिजाज वाले हाकिमों और हसीना जी की एक ‘जूम कॉल’ पर मीटिंग कराई जाए, लेकिन चालाकी से दोनों पक्षों को ‘म्यूट’ पर रख दिया जाए। इससे दोनों अपनी भड़ास भी निकाल लेंगे और शांति भी भंग नहीं होगी।

बिचौलियों की दाल नहीं गलेगी

सच तो यह है कि जब तक ढाका के आसमान से गुस्से के बादल नहीं छंटते, तब तक दिल्ली ‘अतिथि सत्कार’ की नई गाइडलाइंस लिखती रहेगी। कूटनीति के इस खेल में नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस साहब को भी समझ आ गया होगा कि सरकार चलाना और बैंक चलाना दो अलग बातें हैं। जब तक यह ड्रामा चलेगा, ‘काक-वाणी’ तो बस यही गाएगी—”तुम न आए तो क्या, तुम्हारी यादें (और राजनीतिक संकट) तो हर पल हमारे साथ हैं!”


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कागा जी