वाह! बधाई हो भारतवासियों! अपनी खाली जेबों को थोड़ा और सिकोड़ लीजिए, क्योंकि देश की जीडीपी अब 7.8% की रफ़्तार से हवा में उड़ रही है। एनडीटीवी की खबर है कि इस आंकड़े को लेकर राजनीति में उबाल आ गया है। अब भला उबाल क्यों न आए? चाय की केतली भले खाली हो, लेकिन विकास के आंकड़ों का पतीला हमेशा उबलता रहना चाहिए। यह आधुनिक भारत की नई रेसिपी है।
आंकड़ों की मलाई और जनता की खाली कढ़ाई
इस 7.8 प्रतिशत के जादुई आंकड़े ने देश के हर उस बेरोजगार युवा की भूख मिटा दी है, जो पिछले कई सालों से फॉर्म भरने और परीक्षा रद्द होने के अंतहीन चक्रव्यूह में फंसा है। अब उसे किसी रोजगार की क्या जरूरत? वह सुबह-शाम इस आंकड़े की आरती उतारे, उसका कल्याण अपने आप हो जाएगा। मोदी सरकार के नीति-निर्माताओं का गणित वाकई कमाल का है। वे ऐसा फॉर्मूला लाते हैं जिससे महंगाई से त्रस्त आम नागरिक को भी लगने लगता है कि भले ही टमाटर और प्याज तिजोरी में रखने की चीज बन गए हों, पर देश का ‘ग्रोथ इंजन’ बादलों में उड़ रहा है।
विपक्ष का रोना और सरकार का ढोल
अब बात करें हमारे प्यारे विपक्ष की। उनके पेट में इस आंकड़े को देखकर ऐसा दर्द उठा है कि वे तुरंत सांख्यिकी की पुरानी किताबें और कैलकुलेटर लेकर बैठ गए हैं। उनका रोना है कि यह विकास नहीं, बल्कि आंकड़ों की बाजीगरी और ‘सांख्यिकीय मायाजाल’ है। विपक्ष का तर्क है कि जब जमीन पर नौकरियां गायब हैं, तो यह विकास दर आसमान से टपक रही है क्या? दूसरी तरफ, सत्ता पक्ष के प्रवक्ता टीवी चैनलों पर ऐसे छाती ठोक रहे हैं जैसे यह 7.8% का आंकड़ा उन्होंने खुद अपने हाथों से रात भर जागकर तैयार किया हो।
कागजी तरक्की का असली सच
‘काक-वाणी’ का मानना है कि इस देश में तरक्की का सबसे सुरक्षित और गड्ढा-मुक्त रास्ता कागजों से होकर ही गुजरता है। सड़क पर गड्ढे हों तो क्या हुआ, डिजिटल मैप पर तो रास्ता बिल्कुल साफ और चमकीला दिखता है न! ठीक वैसे ही, थाली से दाल-सब्जी गायब हो तो क्या, जीडीपी के बार-चार्ट में तो हरियाली ही हरियाली है। इसलिए बहस बंद कीजिए और इस 7.8% के आंकड़े को सुंदर फ्रेम में जड़वाकर अपने ड्राइंग रूम में टांग लीजिए। जब भी भूख लगे या जेब खाली महसूस हो, बस एक बार इस आंकड़े को देख लीजिएगा, सारा दर्द तुरंत काफूर हो जाएगा!
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