70 साल का हुआ नेशनल फिल्म अवार्ड्स का सफर: जब ‘काक-वाणी’ ने टटोला सिनेमा के इस सबसे बड़े ‘गोल्डन’ सच को!

बॉलीवुड से लेकर कॉलीवुड और टॉलीवुड तक, जब किसी स्टार को अपनी दमदार एक्टिंग का लोहा मनवाना होता है, तो उसकी नजर सिर्फ एक ही ट्रॉफी पर टिकी होती है—’राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार’ (National Film Awards)। डीडी न्यूज की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सिनेमा के इस महाकुंभ ने अपने गौरवशाली 70 साल यानी सात दशक पूरे कर लिए हैं। जी हां, सात दशक का वो जादुई सफरनामा, जिसने भारतीय सिनेमा की तकदीर और तस्वीर दोनों को बदलकर रख दिया। चलिए, आज ‘काक-वाणी’ के इस विशेष बुलेटिन में हम आपको ले चलते हैं इस सफर की कुछ बेहद दिलचस्प गलियों में।

1954 से शुरू हुआ यह ‘नेशनल’ सफरनामा

क्या आप जानते हैं कि जब साल 1954 में इन पुरस्कारों की शुरुआत हुई थी, तब इन्हें ‘राजकीय फिल्म पुरस्कार’ कहा जाता था? उस वक्त शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह छोटा सा सरकारी कदम एक दिन भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी और सबसे विश्वसनीय पहचान बन जाएगा। पहली बार बेस्ट फीचर फिल्म का गोल्ड मेडल मराठी फिल्म ‘श्यामची आई’ को मिला था। तब से लेकर आज तक, इस प्रतिष्ठित मंच ने हर उस कलाकार की पीठ थपथपाई है जिसने कैमरे के पीछे या आगे रहकर कुछ अद्भुत और लीक से हटकर काम किया है।

जब मसालेदार फिल्मों के बीच चमकीं कलात्मक फिल्में

काक-वाणी के पाठकों को बता दें कि नेशनल फिल्म अवार्ड्स की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह सिर्फ बॉक्स ऑफिस के 100 या 500 करोड़ रुपये के कलेक्शन को नहीं देखता। यहाँ कद्र होती है तो सिर्फ बेहतरीन कहानी, डायरेक्शन और बेमिसाल अदाकारी की। यही वजह है कि जहाँ एक तरफ अमिताभ बच्चन, शबाना आजमी और नसीरुद्दीन शाह जैसे दिग्गजों ने यहाँ कई बार अपना परचम लहराया, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय भाषाओं की उन नायाब फिल्मों को भी मुख्यधारा में पहचान मिली जो शायद थिएटर्स के शोर में कहीं खो जातीं। सत्यजीत रे से लेकर मणिरत्नम और हाल के दौर में एसएस राजामौली तक, इस अवॉर्ड ने भारतीय सिनेमा की विविधता को दुनिया के सामने शान से पेश किया है।

राष्ट्रपति के हाथों सम्मान: हर कलाकार का अल्टीमेट सपना

आजकल के चकाचौंध और डांस-मस्ती से भरे प्राइवेट अवार्ड शोज के दौर में भी नेशनल फिल्म अवार्ड्स का रुतबा सबसे अलग और सबसे ऊंचा है। जब देश के राष्ट्रपति के हाथों किसी कलाकार को ‘रजत कमल’ या ‘स्वर्ण कमल’ मिलता है, तो वह पल उनके पूरे करियर की सबसे बड़ी पूंजी बन जाता है। हाल के वर्षों में जिस तरह से अल्लू अर्जुन को ‘पुष्पा’ के लिए बेस्ट एक्टर और आलिया भट्ट-कृति सेनन को बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला, उसने यह साबित कर दिया है कि यह मंच अब परंपरा और आधुनिकता का एक बेहतरीन संगम बन चुका है।

तो दोस्तों, सात दशकों का यह सफर सिर्फ सुनहरी ट्रॉफियों का लेन-देन नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की संस्कृति, सामाजिक बदलावों और भावनाओं का एक जीवंत दस्तावेज है। काक-वाणी की तरफ से भारतीय सिनेमा के इस गौरवशाली और चमचमाते सफर को दिल से सलाम!


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कागा जी