नमस्कार, ‘काक-वाणी’ में आप सभी प्रबुद्ध पाठकों का स्वागत है। ऊपर ऊंचे पेड़ की डाल से जब हम कौवे नीचे इस इंसानी दुनिया को देखते हैं, तो आपकी ‘महानता’ और ‘बुद्धिमत्ता’ पर अनायास ही हमारी ‘कांव-कांव’ हंसी में बदल जाती है। हम पंछी बिना किसी पासपोर्ट या वीजा के पूरा आसमान नाप लेते हैं, और यहाँ धरती पर इंसान खुद के ही बनाए जाल में उलझा जा रहा है।
हाल ही में ‘द इंडिया फोरम’ ने एक बेहद क्रांतिकारी और आधुनिक विचार पेश किया है— “नागरिक, संदिग्ध और पोर्टेबल बॉर्डर”। वाह! क्या गजब की कल्पना है। अब तक हम नादान पक्षी यही समझते थे कि सीमाएं देश के नक्शे पर होती हैं, जहां कंटीले तार होते हैं और सैनिक पहरा देते हैं। लेकिन नए जमाने की डिजिटल और कागजी सरकार ने इस सीमा को ‘पोर्टेबल’ बना दिया है!
जी हां, जैसे आप अपनी जेब में ‘पोर्टेबल चार्जर’ लेकर घूमते हैं ताकि फोन की बैटरी डाउन न हो, वैसे ही अब आप अपनी जेब में एक ‘पोर्टेबल बॉर्डर’ लेकर घूम रहे हैं ताकि आपकी नागरिकता कभी भी डाउन हो सके। इस नई तकनीक का मजा देखिए—आप सुबह उठते हैं देश के एक जागरूक, टैक्स देने वाले सम्मानित नागरिक के रूप में। लेकिन दोपहर होते-होते, जैसे ही आपसे आपके परदादा के जन्म का प्रमाणपत्र मांग लिया जाता है, आप अचानक ‘संदेह के घेरे’ में आ जाते हैं। 1971 से पहले की वंशावली की फाइल नहीं मिली? बधाई हो! आप बिना अपनी जगह से हिले, अपने ही लिविंग रूम में ‘घुसपैठिए’ बन गए। बॉर्डर खुद चलकर आपके घर आ गया है!
यह कितनी सुविधाजनक व्यवस्था है! अब नागरिक साबित होने के लिए देश से प्यार करना काफी नहीं है, बल्कि फाइलों की दीमक से बचे हुए पीले पड़ चुके कागजों की पूजा करना जरूरी है। आज के दौर में नागरिक और संदिग्ध के बीच का अंतर सिर्फ एक सरकारी बाबू की भौंहें तनने जितना ही है।
काक-वाणी का तो मानना है कि इस ‘पोर्टेबल बॉर्डर’ से देश की बेरोजगारी की समस्या भी हमेशा के लिए हल हो सकती है। आधी आबादी अपने पुराने दस्तावेज खोजने और उन्हें लेमिनेट कराने में व्यस्त रहेगी, और बाकी की आधी आबादी उन कागजातों में कमियां निकालकर उन्हें संदिग्ध घोषित करने की नौकरी पाएगी। जीडीपी बढ़े या न बढ़े, लेकिन फोटोकॉपी और नोटरी वालों के अच्छे दिन तो आ ही चुके हैं।
तो प्रिय इंसानों, अगली बार जब आप घर से बाहर निकलें, तो मोबाइल और चाबी के साथ अपना ‘वजूद साबित करने वाला’ कागज भी जेब में रख लें। क्या पता किस नुक्कड़ पर आपका सामना आपके अपने निजी ‘पोर्टेबल बॉर्डर’ से हो जाए। आखिर, बिना शक के कैसी नागरिकता और बिना बॉर्डर के कैसा देश?
तब तक के लिए सुरक्षित रहिए, कागजात संभालिए, और देखते रहिए काक-वाणी! कांव-कांव!
संदर्भ मुख्य समाचार: Citizens, Suspects, and the Portable Border – The India Forum