रील-क्रांति: जब जेन-जी ने इंस्टाग्राम फिल्टर से बदली देश की राजनीति

काक-वाणी के सभी सुधी और ‘अल्ट्रा-मॉडर्न’ पाठकों को काकभुशुंडि का सादर प्रणाम। आज हम एक बेहद गंभीर, संवेदनशील और सबसे बढ़कर ‘ट्रेंडिंग’ मुद्दे पर बात करने जा रहे हैं। एनडीटीवी की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत की ‘जेन-जी’ (Gen-Z) पीढ़ी अब केवल रील्स बनाने और ‘सिग्मा मेल’ बनने में व्यस्त नहीं है, बल्कि वह देश की राजनीति बदल रही है। जी हां, जिस पीढ़ी को सुबह उठकर चाय मिलने से पहले ‘एंग्जायटी’ हो जाती थी, वह अब देश में क्रांति की मशाल लेकर सड़कों पर उतर आई है। बस फर्क सिर्फ इतना है कि यह मशाल अब रिंग-लाइट की रोशनी से जलती है।

रील से रियल वर्ल्ड तक की ‘एस्थेटिक’ यात्रा

पुराने जमाने के क्रांतिकारी कितने पिछड़े थे! वे सूखी रोटियां खाकर जेलों में सड़ जाते थे, लेकिन कभी अपनी फोटो का बैकग्राउंड ब्लर नहीं कर पाए। हमारे आज के जेन-जी क्रांतिकारियों के पास ‘एस्थेटिक’ विरोध प्रदर्शन करने की गजब की कला है। वे सड़क पर तब तक कदम नहीं रखते, जब तक कि उनका सनस्क्रीन पचास एसपीएफ का न हो। हाथ में जो तख्तियां होती हैं, उनके फोंट और कलर पैलेट इतने बेहतरीन होते हैं कि गृह मंत्रालय भी दंग रह जाए।

इनका मुख्य उद्देश्य सरकार को झुकाना नहीं, बल्कि अपनी इंस्टाग्राम ग्रिड को ‘कूल’ और ‘एक्टिविस्ट वाइब’ वाला दिखाना है। अगर प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज करने की तैयारी करे, तो हमारे ये युवा योद्धा पुलिसवाले से कहते हैं, “एक्सक्यूज मी भैया! थोड़ा संभलकर लाठी चलाओ, मेरा आईफोन गिर गया तो पापा नया नहीं दिलाएंगे।” और अगर जेल जाने की नौबत आ जाए, तो पहली चिंता यह होती है कि वहां वाई-फाई की स्पीड कैसी होगी और क्या वे अपनी ‘डेली व्लॉग’ की स्ट्रीक बरकरार रख पाएंगे?

नेताओं की आफत: अब भाषण नहीं, ट्रांजिशन रील्स बनाओ

इस बदलाव से सबसे ज्यादा परेशान हमारे देश के बुजुर्ग राजनेता और उनकी पारंपरिक आईटी सेल के कर्ता-धर्ता हैं। पहले नेताजी तीन घंटे का उबाऊ भाषण देकर जनता को सुला देते थे। लेकिन अब, उन्हें पता चला है कि अगर युवा वोट चाहिए, तो उन्हें नीतिगत बातें नहीं, बल्कि पांच सेकंड के ‘हुक-स्टेप’ वाले रील्स बनाने होंगे।

जब तक नेताजी बैकग्राउंड में ‘मोये-मोये’ या कोई ‘ट्रेंडिंग बीट’ लगाकर वीडियो नहीं डालेंगे, तब तक जेन-जी उन्हें वोट देने की सोचेगा भी नहीं। संसद में बहस अब तर्कों पर नहीं, बल्कि इस बात पर तय होती है कि किस माननीय सांसद के भाषण पर कितने ‘मिलियन व्यूज’ आए और कितने लोगों ने उसे ‘रीपोस्ट’ किया।

अंत में, ‘काक-वाणी’ की ओर से हम इस नई ‘डिजिटल क्रांति’ को नमन करते हैं। उम्मीद है कि देश का संविधान जल्द ही पीडीएफ से बदलकर 15 सेकंड की रील्स के रूप में उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि हमारे युवा उसे भी स्क्रॉल करते हुए ‘लाइक’ और ‘शेयर’ कर सकें। इंकलाब जिंदाबाद, लेकिन पहले कमेंट सेक्शन में अपनी राय जरूर बताएं और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें!


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कागा जी