शहंशाह का दरबार और एक अनोखी शॉल
मुग़ल सल्तनत के दरबार में रोज़ नए मामले आते थे, लेकिन आज का मामला बेहद संवेदनशील था। बादशाह अकबर के सामने न्याय की गुहार लगाने दो लोग खड़े थे। उनके बीच एक बेहद ख़ूबसूरत, मखमली शॉल रखी थी। उस शॉल पर की गई नक्काशी और रेशम की कढ़ाई इतनी जीवंत थी कि देखने वाले की आँखें ठहर जाएँ। इस शॉल पर अपना मालिकाना हक जताने वाले पहले व्यक्ति थे राज्य के अमीर व्यापारी शफ़ीक और दूसरे थे एक वृद्ध, लाचार और नेत्रहीन बुनकर, जिनका नाम दीनू था।
दीनू रोते हुए कह रहे थे, “जहाँपनाह! यह शॉल मेरी दो साल की कड़ी मेहनत का नतीजा है। मैंने अपनी आँखों की रोशनी खोने से पहले इसे अपने दिवंगत बेटे की याद में बुनना शुरू किया था। इसकी एक-एक कढ़ाई में मेरे आँसू और मेरे बच्चे की यादें बसी हैं। शफ़ीक साहब ने इसे मेरे घर से चोरी करवा लिया है।” वहीं, शफ़ीक ने सीना तानकर कहा, “यह सरासर झूठ है, हुज़ूर! यह शॉल मेरे कारखाने के सबसे बेहतरीन कारीगरों ने तैयार की है। यह अंधा बूढ़ा भला इतनी बारीक कलाकारी कैसे कर सकता है?”
बीरबल की चतुराई और दिल की परख
मामला पेचीदा था और कोई गवाह नहीं था। अकबर ने हमेशा की तरह अपने सबसे चतुर मंत्री बीरबल की तरफ देखा। बीरबल ने शॉल को हाथ में लिया, उसे ध्यान से टटोला और फिर मुस्कुराए।
बीरबल ने दरबारियों से कहा, “इस शॉल की कलाकारी वाकई लाजवाब है। इसे बनाने वाले ने इसमें अपनी पूरी आत्मा डाल दी है। इसलिए, असली मालिक का पता लगाने के लिए मैं दोनों से एक छोटा सा सवाल पूछूँगा।”
बीरबल पहले अमीर व्यापारी शफ़ीक के पास गए और पूछा, “शफ़ीक जी, आपके कारीगरों ने इस शॉल को दिन-रात देखकर बनाया है। क्या आप मुझे बता सकते हैं कि इस शॉल के सबसे आखिरी दाहिने कोने पर क्या बना हुआ है और वह किस रंग का है?”
शफ़ीक थोड़ा घबराया, लेकिन अपनी चालाकी दिखाते हुए बोला, “जी बीरबल जी, वहाँ लाल रंग के सुंदर गुलाब के फूल बने हैं।”
आँसुओं से लिखा गया सच
अब बीरबल रोते हुए वृद्ध दीनू के पास पहुँचे। बीरबल ने नम्रता से पूछा, “बाबा, आप तो देख नहीं सकते, लेकिन क्या आप बता सकते हैं कि इस शॉल के उस आखिरी कोने पर क्या अंकित है?”
दीनू के गालों पर आँसू बह निकले। उन्होंने कांपते हाथों को जोड़कर कहा, “हुज़ूर, उस कोने पर कोई फूल या रंग-बिरंगी नक्काशी नहीं है। वहाँ मैंने एक अधूरा सफ़ेद धागा छोड़ दिया था। जब मेरा बेटा बीमार था, तब उसने आखिरी बार उस धागे को छुआ था। उसकी मौत के बाद, मेरे पास इतनी हिम्मत नहीं बची कि मैं उस हिस्से को पूरा कर सकूँ। वह अधूरा धागा मेरे बेटे की अधूरी ज़िंदगी की निशानी है।”
बीरबल ने तुरंत शॉल का वह कोना पलटा। वहाँ सचमुच एक अधूरा सफ़ेद धागा लटका हुआ था, जिस पर कोई कढ़ाई नहीं थी। पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। शफ़ीक का झूठ सबके सामने आ चुका था और उसका चेहरा पीला पड़ गया था।
न्याय और एक नया जीवन
बीरबल ने अकबर से कहा, “जहाँपनाह! चोर अपनी आँखों से देखकर भी शॉल की रूह को नहीं समझ पाया, जबकि इस नेत्रहीन पिता ने अपने दिल की आँखों से इसका एक-एक धागा बयाँ कर दिया। न्याय साफ़ है।”
अकबर की आँखें भी नम हो गईं। उन्होंने शफ़ीक को तुरंत कारागार में डालने का आदेश दिया और उस पर भारी जुर्माना लगाया। जुर्माने की वह राशि दीनू को सौंप दी गई। साथ ही, अकबर ने उस शॉल को शाही खजाने से भारी कीमत देकर खुद खरीद लिया ताकि दीनू का बुढ़ापा सम्मान और सुख से कट सके।
कहानी से सीख
सीख: इस ‘अकबर बीरबल की चतुर कहानी’ से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची कला और भावना को कभी चुराया नहीं जा सकता। केवल बुद्धि से ही नहीं, बल्कि संवेदनशील हृदय से किया गया न्याय ही ईश्वर को प्रिय होता है।