शहंशाह अकबर का दरबार सजा था, लेकिन आज माहौल में हमेशा जैसी रौनक नहीं थी। आज मामला चोरी का था, वह भी शहंशाह की दिवंगत माँ की आखिरी निशानी—एक बेशकीमती सोने के कंगन की चोरी। आरोप लगा था महल के बूढ़े और वफादार माली, रामू पर।
एक बेबस पिता की पुकार
रामू हाथ जोड़े अदालत के बीचों-बीच रो रहा था, “जहाँपनाह, मैंने चोरी नहीं की। मैं तो अपनी मरहूम मल्लिका की निशानी को छूने का पाप भी नहीं सोच सकता।” लेकिन सबूत रामू के खिलाफ थे; वह कंगन बगीचे के एक कोने में, रामू के औजारों के पास मिट्टी में दबा हुआ मिला था।
अकबर अपनी माँ की याद में बेहद भावुक और गुस्से में थे। उन्होंने बिना सोचे-समझे रामू को मृत्युदंड की सजा सुना दी। तभी दरबार का दरवाजा खुला और रामू की दस साल की बेटी, लाडो, रोती हुई अंदर आई। लाडो देख नहीं सकती थी, वह जन्म से अंधी थी। वह अकबर के पैरों में गिर गई और सिसकते हुए बोली, “जहाँपनाह, मेरे पिता निर्दोष हैं। अगर वे चले गए, तो इस अंधी बेटी का सहारा कौन बनेगा? मुझे भी उनके साथ मौत दे दीजिए।”
लाडो की चीख ने पूरे दरबार को झकझोर कर रख दिया। अकबर का दिल भी पसीज गया, लेकिन वे अपने फैसले से पीछे नहीं हटना चाहते थे। उन्होंने असमंजस में बीरबल की तरफ देखा। बीरबल की आँखें भी नम थीं। उन्होंने अकबर से इस गुत्थी को सुलझाने के लिए तीन दिन का समय माँगा।
बीरबल की चतुराई और खोज
बीरबल जानते थे कि तीस साल से महल की सेवा कर रहा रामू कभी चोर नहीं हो सकता। वे उस जगह गए जहाँ कंगन मिला था। वह बगीचे का एक पुराना बरगद का पेड़ था। बीरबल ने देखा कि उस पेड़ की सबसे ऊंची डाल पर एक चील का घोंसला था। बीरबल के दिमाग की बत्ती जली।
उन्होंने एक सिपाही को पेड़ पर चढ़ने को कहा। जब सिपाही ऊपर गया, तो घोंसले में सोने के कंगन जैसी ही कई चमकीली चीजें मिलीं—कांच के टुकड़े, चांदी के सिक्के और पीतल की कटोरी। दरअसल, वह चील महल की खुली खिड़की से चमकीली चीजें चुराकर अपने घोंसले में छुपाती थी, और कंगन भी उसी ने उठाया था, जो बाद में हवा से फिसलकर नीचे रामू के औजारों पर गिर गया था।
न्याय और जज्बात का मिलन
तीसरे दिन बीरबल दरबार में हाजिर हुए। उन्होंने अकबर के सामने कुछ चमकीले पत्थर और गहने रखे। जैसे ही खिड़की खोली गई, बीरबल द्वारा पालतू बनाई गई एक चील ने उड़कर झट से उन गहनों को उठा लिया।
बीरबल ने बेहद शांत और गंभीर आवाज में कहा, “जहाँपनाह, यह बेजुबान परिंदा ही असली चोर है। इसे कानून का ज्ञान नहीं था। लेकिन अगर हम जल्दबाजी में फैसला कर देते, तो एक बेगुनाह पिता की जान चली जाती और एक मासूम बच्ची अनाथ हो जाती। न्याय केवल सजा देने का नाम नहीं है, जहाँपनाह।”
अकबर की आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने तुरंत रामू को आजाद करने का हुक्म दिया और लाडो को गले से लगा लिया। अकबर ने बीरबल की बुद्धिमानी और संवेदनशीलता की जमकर तारीफ की।
सीख
सीख: जल्दबाजी और गुस्से में लिया गया फैसला हमेशा नुकसान पहुंचाता है। सच्चा न्याय वही है जो बुद्धि के साथ-साथ दिल में दया रखकर किया जाए।