वाह! क्या बात है। इसे कहते हैं शेर की मांद में जाकर उसे शाकाहार का उपदेश देना। हाल ही में हमारे विदेश मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को एक अत्यंत ‘मासूम’ और गंभीर नसीहत दे डाली। भारत ने कहा कि UNSC को प्रतिबंधों की प्रक्रिया का इस्तेमाल ‘संकीर्ण राजनीति’ के लिए नहीं करना चाहिए। इस बयान को सुनते ही न्यू यॉर्क के गलियारों में सन्नाटा छा गया होगा, और शायद कुछ स्थायी सदस्यों की आंखों से कूटनीतिक आंसू छलक पड़े होंगे!
वीटो वाले ‘महात्माओं’ और हमारी मासूमियत
अब भला कोई इन नादान वैश्विक शक्तियों को समझाए कि ‘संकीर्ण राजनीति’ क्या होती है? बेचारी UNSC तो हमेशा से वैश्विक शांति, भाईचारे और परमार्थ के लिए ही काम करती आई है! जब भी भारत किसी घोषित आतंकी पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश करता है, और हमारा पड़ोसी चीन अपनी जेब से ‘तकनीकी रोक’ (Technical Hold) वाला वीटो निकाल लाता है, तो वह ‘संकीर्ण राजनीति’ थोड़े ही होती है। वह तो शुद्ध रूप से कूटनीतिक योग और पड़ोसी धर्म का पालन होता है। ऐसे में भारत का यह कहना कि प्रतिबंधों का राजनीतिकरण न करें, वैसा ही है जैसे किसी बिल्ली से कहना कि वह दूध की रखवाली पूरी ईमानदारी से करे।
सुरक्षा परिषद: जहां राजनीति नहीं, सिर्फ ‘प्रसाद’ बंटता है!
UNSC के पांच स्थायी सदस्य तो जैसे कलयुग के पंच परमेश्वर हैं। वे कभी अपने निजी हितों, हथियारों की बिक्री या भू-राजनीतिक वर्चस्व के लिए वीटो का इस्तेमाल नहीं करते। अमेरिका, रूस और चीन तो इस धरती पर केवल शांति की स्थापना के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं। जब भारत ने उन्हें संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठने को कहा, तो यकीनन इन महाशक्तियों के प्रतिनिधियों ने आपस में फुसफुसाकर पूछा होगा— “अरे, यह ‘संकीर्ण राजनीति’ क्या होती है भाई? हम तो केवल अपनी वीटो शक्ति का ‘पवित्र’ उपयोग कर रहे थे!”
काक-वाणी की अंतिम टिप्पणी
अंततः, काक-वाणी भारत की इस ‘नैतिक’ कूटनीति को सलाम करती है। यह जानते हुए भी कि UNSC का असल काम ही महाशक्तियों की स्वार्थी राजनीति को वैध बनाना है, उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ाना किसी वीरता से कम नहीं है। वैसे, इस नसीहत के बाद उम्मीद है कि UNSC के सदस्य अपनी संकीर्ण राजनीति छोड़कर कंदमूल खाएंगे और केवल विश्व शांति की बातें करेंगे। तब तक के लिए, हम स्थायी सदस्यता की कतार में खड़े होकर इस वैश्विक ‘रामलीला’ का आनंद लेते रहेंगे!
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