‘संभावनाओं की कला’ का नया चमत्कार: अब जेडीयू के आंगन में भी लहलहाएगी ‘परिवारवाद’ की फसल!

बिहार की राजनीति में मौसम वैज्ञानिकों की कमी नहीं है, लेकिन जेडीयू के मौसम वैज्ञानिक सबसे अनोखे हैं। वे हवा का रुख देखकर नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री आवास की खिड़कियों से आने वाली सुगबुगाहट को देखकर भविष्यवाणी करते हैं। ताजा खबर यह है कि जेडीयू के एक कर्मठ नेताजी को अचानक यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ है कि “राजनीति संभावनाओं की कला है”। और इस कला का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन यह होगा कि नीतीश कुमार के सुपुत्र निशांत कुमार बिहार के अगले मुख्यमंत्री बन जाएं। जी हां, वही निशांत जो अब तक राजनीति से कोसों दूर अध्यात्म और शांति की खोज में थे!

समाजवाद का नया संस्करण: ‘मेरा बेटा, नया नेता’

सालों-साल तक जो जेडीयू लालू परिवार के ‘परिवारवाद’ पर छाती कूटती रही, आज उसके सुर बदले-बदले नजर आ रहे हैं। वैसे भी, सिद्धांत और नैतिकता तो बस दूसरों को उपदेश देने के लिए होते हैं, जब अपनी बारी आए तो नियम बदल जाते हैं। जब तक लालू प्रसाद यादव का बेटा राजनीति में आए, तो वह ‘जंगलराज की वापसी’ और ‘वंशवाद’ है; लेकिन जब नीतीश बाबू का बेटा रेस में शामिल होने की कगार पर हो, तो इसे ‘संभावनाओं की कला’ और ‘बिहार का सौभाग्य’ कहा जाएगा। इसे कहते हैं शुद्ध, मिलावट-रहित यू-टर्न समाजवाद!

निशांत कुमार की ‘मजबूरी’ और नेताओं की ‘जरूरी’

निशांत कुमार बेचारे अब तक राजनीति की गंदगियों से दूर, एक शांत जीवन जी रहे थे। लेकिन जेडीयू के नेताओं को भला यह शांति कैसे हजम हो? उन्हें लगता है कि जब तक ‘छोटा साहेब’ को जबरन गद्दी पर नहीं बिठाया जाएगा, तब तक उनकी अपनी राजनीतिक वैतरणी कैसे पार होगी? जेडीयू के नेताओं का तर्क भी गजब का है। उनका कहना है कि यदि लालू जी के बेटे उपमुख्यमंत्री बन सकते हैं, तो नीतीश जी के बेटे मुख्यमंत्री क्यों नहीं? वाह! यानी बिहार के युवाओं के लिए अब मुख्यमंत्री बनने की योग्यता सिर्फ यह है कि उनके पिताजी के नाम के आगे ‘पूर्व मुख्यमंत्री’ या ‘वर्तमान मुख्यमंत्री’ लिखा होना चाहिए।

‘काक-वाणी’ का निष्कर्ष

बिहार की जनता को अग्रिम बधाई! उन्हें अब विकास, रोजगार या शिक्षा जैसे उबाऊ मुद्दों पर सोचने की कोई जरूरत नहीं है। उनके सामने विकल्प बेहद स्पष्ट और पारिवारिक हैं—इधर भी बेटा, उधर भी बेटा। बस ब्रांड अलग हैं, माल एक ही है। नीतीश कुमार जी, जिन्होंने ‘सुशासन’ और ‘पार्टी ही परिवार है’ का नारा देकर राजनीति की थी, शायद अब इस नए ‘संभव’ को भी अपनी ‘अंतरात्मा की आवाज’ मानकर स्वीकार कर लें। आखिर राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता, खासकर तब जब अपनी ही कुर्सी को बचाने की ‘संभावना’ सबसे मजबूत हो!


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कागा जी