व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ‘परम सत्य’: यूनेस्को अवार्ड और नासा की गुप्त खोजें

सुबह की पहली किरण के साथ जब आपके फोन की घंटी बजती है, तो समझ लीजिए कि ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ का पहला लेक्चर शुरू हो चुका है। इस महान विश्वविद्यालय के पास ऐसे शोध और सत्य हैं, जो ऑक्सफोर्ड या हार्वर्ड के वैज्ञानिकों के सपनों में भी नहीं आ सकते। यहाँ ज्ञान बटोरने के लिए किसी परीक्षा की नहीं, बल्कि सिर्फ एक अंगूठे और ‘फॉरवर्ड’ बटन की आवश्यकता होती है। ‘काक-वाणी’ के इस विशेष अंक में आज हम व्हाट्सएप के कुछ ऐसे ही वायरल दावों का पोस्टमार्टम करेंगे, जो विज्ञान को भी घुटने टेकने पर मजबूर कर देते हैं।

यूनेस्को का वो ‘सालाना’ सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान पुरस्कार

पिछले दस सालों से यूनेस्को (UNESCO) हर साल नियम से भारत के राष्ट्रगान को ‘दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान’ घोषित कर रहा है। यूनेस्को के खुद के अधिकारी हैरान और परेशान हैं कि उन्होंने यह पुरस्कार कब और किस मीटिंग में दिया था, लेकिन हमारे व्हाट्सएप के ‘कुलपति’ इसे हर स्वतंत्रता दिवस पर बिना थके पूरे जोश के साथ बांटते हैं। नासा (NASA) के वैज्ञानिक भी इस बात से चिंतित हैं कि कैसे भारत के लोग दीवाली की रात अंतरिक्ष से खिंची गई उसी पुरानी, रंग-बिरंगी तस्वीर को हर साल नई बताकर शेयर कर देते हैं। नासा वाले आज तक ढूँढ रहे हैं कि वो चमकीला भारत उनके कैमरे में दोबारा क्यों नहीं दिखता!

इलायची से कैंसर का इलाज और लहसुन से कोरोना का खात्मा

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का योगदान नोबेल पुरस्कार के योग्य है। यहाँ कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज सुबह खाली पेट गर्म पानी में नींबू और अदरक का रस मिलाकर पीने से सेकंडों में हो जाता है। कीमोथेरेपी कराने वाले डॉक्टर तो बस अपनी दुकानें चला रहे हैं, असली इलाज तो ‘वर्मा जी’ द्वारा फॉरवर्ड किए गए उस मैसेज में है, जिसमें बताया गया है कि तकिए के नीचे लहसुन रखकर सोने से 5G की खतरनाक तरंगें और हर तरह के वायरस आसपास भी नहीं फटकते। जीवविज्ञान की ऐसी-तैसी करने में इस यूनिवर्सिटी को महारत हासिल है।

सत्य परेशान है, लेकिन ‘फॉरवर्ड’ बटन चालू है

इस विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यहाँ ‘तथ्य जाँच’ (Fact Check) जैसी फालतू चीजों के लिए कोई जगह नहीं है। यहाँ तर्क नहीं, भावनाएं चलती हैं। अगर किसी मैसेज के नीचे लिखा हो कि ‘इसे तुरंत 11 लोगों को भेजें, शाम तक बड़ी खुशखबरी मिलेगी’, तो पढ़े-लिखे लोग भी बिना सोचे-समझे उंगलियां चलाने लगते हैं। सच तो यह है कि जब तक हमारे पास बिना सोचे-समझे ‘फॉरवर्ड’ करने की आजादी है, तब तक झूठ का यह कारोबार और नासा-यूनेस्को के ये फर्जी कारनामे हमारे इनबॉक्स की शोभा बढ़ाते रहेंगे। जय हो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की!

कागा जी