एक प्यारा परिवार और रक्षक शेरू
सुंदरपुर नामक एक छोटे से गांव में रामू अपनी पत्नी राधा और अपने छह महीने के मासूम बच्चे के साथ रहता था। रामू बहुत गरीब था, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। एक तूफानी रात में रामू को सड़क पर एक लावारिस पिल्ला मिला, जो ठंड से कांप रहा था। रामू उसे अपने घर ले आया और उसका नाम ‘शेरू’ रखा। समय के साथ शेरू बड़ा हो गया और वह केवल एक पालतू जानवर नहीं, बल्कि उस परिवार का सबसे वफादार सदस्य बन गया। वह रामू के बच्चे की चौबीसों घंटे रखवाली करता था।
वह काली दोपहर और भयानक संकट
एक दिन दोपहर के समय रामू खेत पर गया हुआ था। राधा को कुएं से पानी लाने के लिए बाहर जाना पड़ा। बच्चा पालने में शांति से सो रहा था। राधा ने शेरू की तरफ देखा और प्यार से कहा, “शेरू, मैं तुरंत पानी लेकर आती हूँ, मेरे बच्चे का ध्यान रखना।” शेरू ने अपनी पूंछ हिलाकर मानो अपनी मालकिन को आश्वस्त किया। राधा के जाने के कुछ ही समय बाद, कमरे के एक कोने से एक बड़ा और जहरीला काला नाग बच्चे के पालने की तरफ बढ़ने लगा। शेरू की नजर उस रेंगते हुए काल पर पड़ी। अपने नन्हे मालिक की जान खतरे में देख शेरू का खून खौल उठा। वह बिना डरे सांप पर झपट पड़ा। दोनों के बीच एक भयानक लड़ाई हुई। शेरू ने अपनी जान की बाजी लगाकर उस जहरीले सांप को मार डाला और उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। इस खूनी संघर्ष में सांप का खून शेरू के मुंह और पंजों पर लग गया।
जल्दबाजी का विनाशकारी निर्णय
जब राधा पानी का घड़ा लेकर वापस लौटी, तो उसने दरवाजे पर शेरू को खड़ा पाया। शेरू का मुंह और शरीर खून से लथपथ था। वह खुशी से अपनी पूंछ हिलाते हुए राधा के पैरों के पास आया, मानो कह रहा हो कि उसने अपना फर्ज निभा दिया। लेकिन राधा ने जैसे ही शेरू के मुंह पर खून देखा, उसका दिमाग सुन्न हो गया। उसके मन में केवल एक ही भयानक विचार आया कि इस जानवर ने उसके मासूम बच्चे को मार डाला है। क्रोध, डर और ममता के पागलपन में आकर राधा ने पानी से भरा भारी घड़ा पूरी ताकत से शेरू के सिर पर दे मारा। शेरू ने दर्द से एक करुण चीख मारी और जमीन पर गिर पड़ा। उसकी आंखों में अपनी मालकिन के लिए कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गहरा दर्द और अविश्वास था। कुछ ही पलों में शेरू ने दम तोड़ दिया।
सत्य का उजाला और अंतहीन आंसू
रोती-बिलखती राधा भागते हुए कमरे के अंदर गई। वहां का नजारा देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका बच्चा पालने में सुरक्षित खेल रहा था और खिलखिलाकर हंस रहा था, जबकि पालने के ठीक नीचे एक विशाल काले सांप का क्षत-विक्षत शरीर पड़ा था। राधा को तुरंत अपनी भयानक भूल का एहसास हो गया। शेरू ने तो अपनी जान पर खेलकर उसके बच्चे की रक्षा की थी, और उसने बदले में अपने सबसे वफादार रक्षक की जान ले ली। राधा शेरू के बेजान शरीर से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगी, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। उसके पश्चाताप के आंसू शेरू को दोबारा जीवित नहीं कर सकते थे।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह अमूल्य सीख मिलती है कि “बिना सोचे-समझे और अत्यधिक क्रोध में लिया गया कोई भी निर्णय हमेशा विनाशकारी परिणाम लाता है।” किसी भी परिस्थिति में पूरी सच्चाई जाने बिना जल्दबाजी में उठाया गया कदम जीवनभर का नासूर बन जाता है। इसलिए, आवेश में आकर कभी कोई कदम न उठाएं।