एक माँ का असहनीय दर्द
बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में गौतमी नाम की महिला रहती थी। उसका एक ही बेटा था, जो उसकी आँखों का तारा और जीने का इकलौता सहारा था। लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन अचानक गंभीर बीमारी के कारण उसके मासूम बेटे की मृत्यु हो गई। गौतमी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। वह इस सच को स्वीकार ही नहीं कर पा रही थी कि उसका बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा। वह पागलों की तरह अपने मृत बच्चे को छाती से लगाए घर-घर भटकने लगी और लोगों से उसे जीवित करने की भीख मांगने लगी।
महात्मा बुद्ध की शरण में
गाँव के लोगों ने उसके दुख को देखकर तरस खाया, लेकिन किसी के पास उसकी इस असहनीय पीड़ा का कोई समाधान नहीं था। आखिरकार, एक दयालु बुजुर्ग ने तड़पती हुई माँ से कहा, “पुत्री, तुम सीधे महात्मा बुद्ध के पास जाओ। इस संसार में केवल वही तुम्हारे बेटे को दोबारा जीवित करने का मार्ग दिखा सकते हैं।” आशा की एक आखिरी किरण लेकर गौतमी रोती-बिलखती हुई बुद्ध के चरणों में जा गिरी। उसने रोते हुए याचना की, “हे महात्मा! मेरे इस इकलौते बच्चे को जीवनदान दे दीजिए, इसके बिना मैं जीवित नहीं रह पाऊँगी।”
एक मुट्ठी सरसों के दाने
बुद्ध ने गौतमी के बहते आँसुओं और उसके भीतर की तड़प को देखा। उन्होंने अत्यंत शांत और करुणामयी स्वर में कहा, “मैं तुम्हारे बेटे को अवश्य जीवित कर दूँगा। लेकिन इसके लिए तुम्हें मेरे लिए एक छोटा सा काम करना होगा।” गौतमी ने उत्सुकता से पूछा, “क्या काम महाराज? मैं अपने बच्चे के लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ।” बुद्ध ने कहा, “तुम मुझे किसी ऐसे घर से एक मुट्ठी सरसों के दाने ला कर दो, जहाँ कभी किसी की मृत्यु न हुई हो।”
जीवन का सबसे बड़ा सच
गौतमी तुरंत उम्मीद के साथ गाँव की ओर दौड़ी। वह पहले घर गई और कहा, “मुझे एक मुट्ठी सरसों के दाने चाहिए, लेकिन शर्त यह है कि आपके घर में कभी किसी की मौत न हुई हो।” घर के मालिक ने उदास होकर कहा, “बहन! सरसों के दाने तो तुम जितने चाहो ले लो, लेकिन मेरे घर में तो पिछले साल ही मेरे पूज्य पिता की मृत्यु हुई है।”
गौतमी दूसरे घर गई, तो वहाँ पता चला कि कुछ ही समय पहले उनकी जवान बेटी का देहांत हुआ था। वह तीसरे, चौथे, और पूरे गाँव के हर घर में गई, लेकिन उसे एक भी ऐसा घर नहीं मिला जहाँ किसी प्रियजन की मृत्यु न हुई हो। किसी ने अपने बच्चे को खोया था, तो किसी ने पति, माता या पिता को। हर घर में मौत का मातम कभी न कभी छा चुका था।
शाम होते-होते गौतमी थककर चूर हो गई। लेकिन इस खोज ने उसके मन का अज्ञानता रूपी अंधकार दूर कर दिया था। उसे समझ आ गया था कि मृत्यु जीवन का अंतिम और अटल सच है, जिससे कोई भी बच नहीं सकता। वह वापस बुद्ध के पास खाली हाथ लौटी, लेकिन इस बार उसकी आँखों में विलाप के आँसू नहीं, बल्कि एक गहरा संतोष और ज्ञान था। उसने अपने मृत पुत्र का अंतिम संस्कार किया और बुद्ध की शरण में चली गई।
कहानी से सीख
सीख: यह भावुक लोककथा हमें सिखाती है कि संसार में जो भी आया है, उसका जाना तय है। मृत्यु ही इस जीवन का सबसे बड़ा और एकमात्र सत्य है। अपनों के जाने का दुख असहनीय होता है, लेकिन मोह और शोक में डूबकर खुद को नष्ट करने के बजाय, हमें जीवन की अनित्यता को स्वीकार करना चाहिए और जो पल हमारे पास हैं, उन्हें शांति और प्रेम से जीना चाहिए।