‘साहित्यकार’ सोनिया गांधी: जब ‘मौन’ रहने वाली ‘महा-शासिका’ ने उठाई कलम!

भारतीय राजनीति के रंगमंच पर सालों तक नेपथ्य में रहकर ‘रिमोट कंट्रोल’ से सत्ता का सुमधुर संगीत बजाने वाली आदरणीय सोनिया गांधी जी अब एक नए अवतार में हमारे सामने हैं। ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका ने घोषणा की है कि सोनिया जी का ‘दूसरा अंक’ (सेकंड एक्ट) शुरू हो चुका है और वे अब एक ‘लेखिका और समीक्षक’ बन चुकी हैं। वाह! जिस देश ने सालों तक उनके मुखर मौन को ही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक योग्यता माना, आज उसी देश को उनके लिखे शब्दों की मीमांसा करने का परम सौभाग्य मिलेगा। देश के स्थापित लेखकों को अब अपनी कलम तोड़ देनी चाहिए, क्योंकि अब असली ‘साहित्य’ दस जनपथ से बहेगा।

कलम की ताकत और दस जनपथ का नया अवतार

सोचिए, जो नेता दशकों तक पहले से लिखे-लिखाए भाषणों को अत्यंत गंभीर भाव से पढ़ने के लिए प्रसिद्ध रहीं, वे अब खुद दूसरों के लेखन की साहित्यिक समीक्षा करेंगी। यह इतिहास की सबसे बड़ी और मधुर विडंबना नहीं तो और क्या है? दस जनपथ से जो ‘शाही फरमान’ निकलते थे, वे अब ‘पुस्तकों की समीक्षा’ के रूप में बाहर आएंगे। अंतर सिर्फ इतना होगा कि पहले कांग्रेसी उन आदेशों को बिना पढ़े ही सिर माथे लगाते थे, और अब वे इन साहित्यिक समीक्षाओं को बिना समझे ‘अद्भुत, युगांतकारी, और कालजयी’ घोषित करेंगे।

नोबेल पुरस्कार की तैयारी और कांग्रेसी चाटुकारिता

कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के लिए यह खबर किसी राष्ट्रीय त्योहार से कम नहीं है। अब चाटुकारिता के लिए नए साहित्यिक विशेषणों की खोज शुरू हो चुकी होगी। पार्टी के भीतर इस बात पर गंभीर मंथन छिड़ गया होगा कि सोनिया जी को सीधे साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिलवाया जाए या पहले बुकर प्राइज से ही काम चला लिया जाए। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के लिए अब नया ‘पॉलिटिकल सिलेबस’ तैयार है। उन्हें अब रैलियों में नारे लगाने के साथ-साथ सोनिया जी की समीक्षाओं के पैराग्राफ भी कंठस्थ करने होंगे।

भविष्य की कृतियां और ‘लॉन्चिंग’ का अनोखा हुनर

एक लेखिका के रूप में सोनिया जी की आने वाली पुस्तकों के विषय बेहद दिलचस्प हो सकते हैं। ‘काक-वाणी’ का सुझाव है कि उनका पहला उपन्यास ‘द आर्ट ऑफ साइलेंट गवर्नेंस’ (मौन शासन की कला) होना चाहिए। इसके बाद वे ‘हाउ टू लॉन्च ए प्रिंस 100 टाइम्स’ (एक राजकुमार को सौ बार री-लॉन्च करने की कला) पर एक गाइडबुक लिख सकती हैं। बहरहाल, साहित्य जगत में उनका स्वागत है। अब देखना यह होगा कि उनकी पहली किताब के बाजार में आते ही कितनी प्रतियां कांग्रेस के जिला कार्यालयों द्वारा अनिवार्य रूप से खरीदी जाती हैं!


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कागा जी