कश्मीर और बॉलीवुड का वो ‘थ्रिलर’ दर्द: जब बंदूकों के साये में थम गई थी सिनेमा की धड़कन!

बॉलीवुड और कश्मीर का रिश्ता उतना ही पुराना है, जितना कि फिल्मों में हीरो-हीरोइन का प्यार। एक जमाना था जब शम्मी कपूर वादियों में ‘याहू’ चिल्लाते थे और राजेश खन्ना बर्फ के बीच रोमांस करते थे। लेकिन फिर आया एक ऐसा दौर, जिसने इस खूबसूरत प्रेम कहानी में विलेन की एंट्री करा दी। जी हां, हम बात कर रहे हैं कश्मीर में आतंकवाद के उस दौर की, जिसने वहां के सिनेमाघरों और फिल्मी शूटिंग पर ताला लगा दिया था। हाल ही में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट ने इस दर्दनाक सफर के पन्नों को एक बार फिर पलटा है और बताया है कि कैसे कश्मीर से सिनेमा की रौनक छिन गई थी।

जब सिनेमाघरों पर लग गया हमेशा के लिए ‘द एंड’ का बोर्ड

साल 1989 तक कश्मीर में सिनेमा देखना एक त्योहार की तरह था। श्रीनगर के ‘रीगल’, ‘पल्लाडियम’ और ‘शिराज’ जैसे शानदार थियेटरों में दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ती थी। लेकिन 1989 के ढलते ही घाटी में आतंकवाद ने अपने पैर पसारे और कश्मीरी सिनेमा प्रेमियों के लिए मानो ‘शो’ हमेशा के लिए बंद हो गया। आतंकवादी संगठनों ने सिनेमाघरों को ‘गैर-इस्लामिक’ और पश्चिमी संस्कृति का हिस्सा घोषित कर दिया और इन्हें बंद करने का फरमान सुना दिया। देखते ही देखते, जिन थियेटरों में कभी तालियां और सीटियां गूंजती थीं, वहां सन्नाटा पसर गया और वो थियेटर सुरक्षा बलों के कैंप या खंडहरों में तब्दील हो गए।

स्विट्जरलैंड बना ‘बॉलीवुड का नया कश्मीर’

घाटी का यह खौफनाक दौर सिर्फ स्थानीय लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि कश्मीर सिनेमा और बॉलीवुड मेकर्स के लिए भी बड़ा झटका था। जब वादियों में बंदूकों की आवाजें गूंजने लगीं, तो कैमरों की गड़गड़ाहट पूरी तरह थम गई। निर्देशकों को अपनी फिल्मों की शूटिंग के लिए कश्मीर का विकल्प ढूंढना पड़ा। इसी मजबूरी ने यश चोपड़ा जैसे दिग्गज फिल्मकारों को स्विट्जरलैंड की खूबसूरत वादियों की तरफ रुख करने पर मजबूर किया। कश्मीर की जो हसीन वादियां कभी ‘सिलसिला’ और ‘कश्मीर की कली’ जैसी फिल्मों की जान हुआ करती थीं, वो अब बॉलीवुड के लिए एक ‘नो-गो जोन’ बन चुकी थीं।

क्या फिर से लौट रही है वादियों में बहार?

काक-वाणी के पाठकों को बता दें कि वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता। दशकों के लंबे और दर्दनाक इंतजार के बाद, अब कश्मीर की वादियों में फिर से सिनेमा की बहार लौट रही है। हाल के वर्षों में न केवल वहां नए मल्टीप्लेक्स खुले हैं, बल्कि स्थानीय लोगों में फिल्मों को लेकर पुराना क्रेज फिर से जाग रहा है। अब वहां के युवा थियेटरों में फिल्म देखने जा रहे हैं। उम्मीद है कि कश्मीर और बॉलीवुड का यह अधूरा रोमांस अब एक नई, सुरक्षित और बेहद खूबसूरत स्क्रिप्ट लिखेगा!


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कागा जी