ब्रिक्स की प्लेट में ‘चिकन’ बनाम ‘पनीर’: वैश्विक कूटनीति की सबसे बड़ी ‘थाली जंग’

वाह रे हमारी राजनीति! दुनिया के सबसे ताकतवर नेता रूस के कजान में बैठकर डॉलर को पटकनी देने और नया वर्ल्ड ऑर्डर बनाने की कसम खा रहे थे, और हमारी राष्ट्रवादी सरकार व सतर्क विपक्षी सेनाएं इस बात पर सिर-फुटौव्वल कर रही थीं कि मेहमानों की प्लेट में मुर्गा ज्यादा था या पनीर! आखिर ‘काक-वाणी’ इस ऐतिहासिक और क्रांतिकारी राष्ट्रीय बहस को दर्ज करने से कैसे चूक सकती है?

राहुल गांधी: देश के नए ‘चीफ फूड इंस्पेक्टर’

विपक्ष के तेजस्वी नेता राहुल गांधी ने हाल ही में एक नया और बेहद गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने कूटनीतिक भोजन की थाली पर गणित का ऐसा बेजोड़ इस्तेमाल किया कि महान गणितज्ञ भी हैरान रह जाएं। राहुल जी ने देश को सचेत किया कि ब्रिक्स के नेताओं को परोसे गए भोजन में 80% भोजन ‘नॉन-वेज’ था। अब भला इस देश में बेरोजगारी, महंगाई और सीमा सुरक्षा जैसे तुच्छ मुद्दों से बड़ा मुद्दा और क्या हो सकता है? राहुल जी को शायद यह चिंता सता रही थी कि कहीं व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग को जबरन ‘चिकन टिक्का’ खिलाकर उनके ‘सद्भाव’ को भ्रष्ट करने की साजिश तो नहीं रची जा रही थी? आखिर ‘मोहब्बत की दुकान’ में शाकाहारी पनीर टिक्का का बहुमत होना बेहद जरूरी है!

भाजपा का पलटवार: मेन्यू कार्ड पर राष्ट्रवाद

अब जब विपक्ष ने विदेशी मेहमानों की थाली में झांक ही लिया, तो सत्तापक्ष भला पीछे कैसे रहता? भाजपा ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया और कांग्रेस पर ‘थाली-द्रोह’ का आरोप मढ़ दिया। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस अब खाने की प्लेट पर भी गंदी राजनीति कर रही है। भाजपा प्रवक्ताओं का दर्द बिल्कुल जायज है। विदेशी मेहमानों को क्या परोसा गया, यह देश की ‘परम गोपनीय विदेश नीति’ का हिस्सा है। क्या पता, यह 80% नॉन-वेज भोजन ही चीन और रूस को भारत के करीब लाने की कोई गुप्त कूटनीति हो? कूटनीति के इस ‘तंदूरी और कबाब’ मॉडल को समझना राहुल गांधी के बस की बात नहीं है!

काक-वाणी का निष्कर्ष: भूखे भजन न होय गोपाला!

हमारा मानना है कि अगली बार जब भी कोई अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन हो, तो विदेश मंत्रालय को एक ‘सर्वदलीय मेन्यू-सेंसर बोर्ड’ बना देना चाहिए। इसमें सत्ता और विपक्ष के नेता मिलकर तय करें कि पुतिन को ‘पनीर लबाबदार’ दिया जाए या ‘मटन कोरमा’। वैसे, जनता भी धन्य है जो इस बात पर चर्चा कर रही है कि वैश्विक मंच पर भारत का डंका बज रहा है या सिर्फ ‘चिकन लेग पीस’ की हड्डियां बज रही हैं। जय हो हमारे नेताओं की, जो कूटनीति की थाली में भी अपना सियासी तड़का लगा ही देते हैं!


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कागा जी