ब्रिटेन के गोरे साहबों के मशहूर अखबार ‘द इकोनॉमिस्ट’ को फिर से पेट दर्द उठा है। इस बार उन्हें चिंता सता रही है कि भारत सरकार अपने देश में ‘घुसपैठियों’ को रोकने के चक्कर में अपने ही नागरिकों को कानूनी, प्रशासनिक और डिजिटल चक्रव्यूह में फंसा रही है। अरे भाई, इन विलायती बुद्धिजीवियों को हमारी ‘क्रोनोलॉजी’ भला कहाँ समझ आएगी? जब तक देश का आम नागरिक खुद को ‘नागरिक’ साबित करने के लिए दफ्तरों के चक्कर न काटे और अपनी सात पीढ़ियों के कागजात न ढूंढ लाए, तब तक उसमें देशभक्ति का वो असली उबाल कैसे आएगा? हमारे गृहमंत्री अमित शाह जी ने जो क्रोनोलॉजी समझाई थी, वह असल में देशवासियों को आत्मनिर्भर बनाने का एक अनोखा तरीका थी—दस्तावेज खोजने में आत्मनिर्भर!
घुसपैठिया ढूंढने का स्वदेशी ‘मास्टरस्ट्रोक’
अब ‘द इकोनॉमिस्ट’ वाले रोना रो रहे हैं कि भारत अपने ही लोगों को फंसा रहा है। अजी, इसे ‘फंसाना’ नहीं, बल्कि ‘सुरक्षित घेरे में लेना’ कहते हैं। सरकार की दूरदर्शी सोच तो देखिए! अगर हम हर भारतीय को आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी, राशन कार्ड और मोबाइल नंबर के ‘लिंकिंग’ के महा-जाल में बांध देंगे, तो बेचारा नागरिक बैंक की लाइन और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने में ही इतना व्यस्त रहेगा कि उसे किसी फालतू विरोध-प्रदर्शन में जाने का समय ही नहीं मिलेगा। जब देश का नागरिक अपनी नागरिकता बचाने की फाइलों में दबा रहेगा, तो देश स्वतः ही सुरक्षित रहेगा। इसे कहते हैं आपदा में अवसर ढूंढना!
कागजों की जंग और ‘काक-वाणी’ का कड़वा सच
असल में, इस पूरे सिस्टम की खूबसूरती ही यही है। सीमा पार से आने वाले असली घुसपैठिए शायद फर्जी दस्तावेज बनाकर मजे से घूम रहे होंगे, लेकिन हमारे रामलाल जी पिछले तीन महीनों से पटवारी के दफ्तर के चक्कर काट रहे हैं ताकि यह साबित कर सकें कि उनके परदादा जी 1971 से पहले इसी मिट्टी में हल चलाते थे। ‘द इकोनॉमिस्ट’ जैसी विदेशी संस्थाओं को यह बुनियादी बात समझ नहीं आती कि भारत में नागरिकता कोई जन्मसिद्ध अधिकार नहीं, बल्कि एक कठिन ‘प्रतियोगी परीक्षा’ है, जिसे हर नागरिक को समय-समय पर पास करना पड़ता है। अगर आप लाइन में खड़े होकर अपनी भारतीयता साबित नहीं कर सकते, तो आपको इस देश में रहने का क्या हक है?
इसलिए, हे विलायती पत्रकारों! भारत की इस घरेलू क्रोनोलॉजी पर ज्ञान देना बंद करो। हमारे यहाँ भले ही कोई घुसपैठिया पकड़ा जाए या न पकड़ा जाए, लेकिन देश के मूल नागरिक का ‘एक्टिव’ और ‘परेशान’ रहना बेहद जरूरी है। आखिर, सरकार के बनाए चक्रव्यूह में फंसे बिना भारतीय होने का असली रोमांच आ ही नहीं सकता!</p
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