मुग़ल सल्तनत में बीरबल की बुद्धिमानी और चतुराई के हजारों किस्से मशहूर थे। लेकिन आज दरबार में जो मामला आया था, उसने हर किसी के दिल को झकझोर कर रख दिया था। यह मामला किसी धन-दौलत की चोरी का नहीं, बल्कि एक गरीब पिता के आंसुओं और उसकी भावनाओं का था।
एक पिता का रोता हुआ दिल
दरबार में देवदास नाम का एक वृद्ध मूर्तिकार रोता हुआ हाजिर हुआ। बुढ़ापे के कारण उसके हाथ कांप रहे थे और आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उसने शहंशाह अकबर के सामने घुटने टेक दिए और रोते हुए कहा, “जहाँपनाह! कल रात मेरे घर से वह छोटा सा लकड़ी का संदूक चोरी हो गया, जिसमें मेरे स्वर्गीय सैनिक बेटे का आखिरी पत्र और उसकी बहादुरी का पदक रखा था। मेरे पास जीने का यही एक सहारा था। मुझे धन-दौलत नहीं चाहिए, मुझे बस मेरे बेटे की आखिरी निशानी वापस दिला दीजिए।”
बूढ़े पिता का दर्द देखकर शहंशाह अकबर का दिल पसीज गया। उन्होंने तुरंत सैनिकों को चोर की तलाश करने का आदेश दिया। संदेह महल के ही कुछ नए नियुक्त किए गए सेवकों पर था, क्योंकि देवदास महल के पास ही रहता था और उन सेवकों को उसके घर के आसपास देखा गया था। लेकिन बिना किसी पुख्ता सबूत के किसी को अपराधी घोषित करना न्याय के खिलाफ था। अकबर ने बीरबल की तरफ देखा, जिनकी आँखों में भी उस पिता के लिए हमदर्दी साफ नजर आ रही थी।
बीरबल की अनोखी और जादुई हांडी
बीरबल ने वृद्ध देवदास को सांत्वना दी और कहा, “बाबा, आप धीरज रखिए। आपके बेटे की यादें आपके पास सुरक्षित लौट आएंगी।” बीरबल ने तुरंत उन सभी पाँच संदिग्ध सेवकों को दरबार में हाजिर होने का हुक्म दिया।
जब सभी सेवक सामने खड़े हुए, तो बीरबल ने एक काली मिट्टी की बंद हांडी मंगवाई और उसे बीच में रख दिया। बीरबल ने गंभीर आवाज में कहा, “इस हांडी के अंदर एक अनोखी और जादुई शक्ति है। तुम सबको एक-एक करके इस बंद कमरे में जाना है और इस हांडी को अपने दोनों हाथों से छूकर कसम खानी है कि तुमने चोरी नहीं की है। जिसने चोरी नहीं की होगी, वह बेदाग बाहर आएगा। लेकिन जिसने चोरी की होगी, यह जादुई हांडी उसके हाथ काले कर देगी।”
दरअसल, बीरबल ने उस हांडी के बाहरी हिस्से पर चुपके से काला कोयला और एक विशेष सुगंधित इत्र लगवा दिया था। जो भी सच्चा इंसान होगा, वह बिना किसी डर के हांडी को छुएगा और उसके हाथ काले हो जाएंगे। लेकिन असली चोर पकड़े जाने के डर से हांडी को केवल छूने का नाटक करेगा और उसे वास्तव में छुएगा ही नहीं।
चोर का पर्दाफाश और भावुक न्याय
एक-एक करके सभी सेवक कमरे के अंदर गए और बाहर आए। बीरबल ने सभी को अपने हाथ आगे करने का आदेश दिया। चार सेवकों के हाथ काले थे और उनसे इत्र की महक आ रही थी। लेकिन पाँचवें सेवक के हाथ बिल्कुल साफ थे।
बीरबल ने तुरंत उस पाँचवें सेवक का हाथ पकड़ा और कड़कती आवाज में कहा, “जहाँपनाह, यही असली चोर है! इसने पकड़े जाने के डर से जादुई हांडी को छुआ ही नहीं।”
चोर डर के मारे कांपने लगा और तुरंत बीरबल के पैरों में गिर पड़ा। उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया और रोते हुए वह संदूक लौटा दिया। जब देवदास को अपने बेटे का संदूक वापस मिला, तो उसने उसे अपने सीने से लगा लिया। उसकी आँखों से बहते आंसू अब ख़ुशी और सुकून के आंसुओं में बदल चुके थे।
कहानी की सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि बुद्धि और चतुराई का सही उपयोग केवल अपराधियों को सजा देने के लिए नहीं, बल्कि किसी बेबस इंसान की भावनाओं की रक्षा करने और उसे सच्चा न्याय दिलाने के लिए किया जाना चाहिए। सत्य की राह पर चलने वालों का ईश्वर हमेशा साथ देता है।