लिबरल छाते के नीचे सेक्युलर बुद्धिजीवी: जब ‘कौम’ को बचाने के लिए मिला नया नुस्खा!

स्वागत है आपका ‘काक-वाणी’ के विशेष बौद्धिक सर्कस में! हाल ही में अंग्रेजी पत्रकारिता के मसीहा ‘द प्रिंट’ ने एक ऐसा ज्ञान का मोती उगला है, जिसे पढ़कर हमारी कौवे जैसी तीक्ष्ण बुद्धि भी चकरा गई है। उनका कहना है कि भारत में ‘मुस्लिम विद्रोहियों’ या लीक से हटकर सोचने वालों को ‘कवर’ यानी सुरक्षा कवच की जरूरत है। उनका तर्क है कि आखिर सारा दोष बेचारी ‘कौम’ पर ही क्यों मढ़ा जाए? भारतीय गणतंत्र को भी तो अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए!

सेक्युलरिज्म की नई छतरी और ‘स्पेशल कवर’ की खोज

वाह! क्या क्रांतिकारी विचार है। अब तक तो हमारे देश में सिर्फ बड़े नेताओं और अभिनेताओं को ही सुरक्षा घेरा मिलता था, लेकिन अब शायद ‘वैचारिक विद्रोहियों’ के लिए भी एक स्पेशल ‘लिबरल छाता’ तैयार किया जा रहा है। हमारा सेक्युलर इकोसिस्टम इस बात से बेहद चिंतित है कि जब भी कोई प्रगतिशील मुस्लिम समाज की रूढ़ियों के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे अपनी ही बिरादरी से ‘फतवे’ मिलते हैं और तथाकथित सेक्युलर गिरोह से ‘गहरी चुप्पी’।

काक-वाणी पूछती है कि जब सच बोलने पर खुद आपके अपने ही आपको किनारे लगा देते हैं, तो इसमें बेचारे सीधे-सादे भारतीय गणतंत्र की क्या गलती? क्या अब सरकार हर उस व्यक्ति के पीछे पुलिस बल खड़ा करे जो अपनी ही कौम के पाखंड को उजागर करना चाहता है? असल में, इन सुधारकों को खतरा गणतंत्र से नहीं, बल्कि उसी रूढ़िवादी सोच से है जिसे सेक्युलर राजनीति हवा देती रही है।

जब कौम की खता पर राजनीति मुस्कुराती है

दिक्कत यह है कि जब चुनाव आते हैं, तो यही सेक्युलर इकोसिस्टम और राजनीतिक दल सबसे कट्टरपंथी तत्वों के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। उस वक्त किसी प्रगतिशील विद्रोही की आवाज इन दलों को सुहाती नहीं है, क्योंकि उससे वोट बैंक खिसकने का डर रहता है। लेकिन जब अपनी नाकामी छिपानी हो, तो यह नया विलाप शुरू हो जाता है कि ‘हाय! गणतंत्र ने विद्रोहियों को कवर नहीं दिया।’

यह तो वही बात हुई कि आग खुद लगाओ और फायर ब्रिगेड न आने का रोना दूसरों के सामने रोओ। कमाल का दोगलापन है! एक तरफ आप कट्टरपंथियों को मंच पर बगल में बैठाकर बिरयानी खिलाते हैं, और दूसरी तरफ जब कोई सुधारक खड़ा होता है, तो सरकार से उसके लिए ‘विशेष सुरक्षा’ की भीख मांगते हैं। सच तो यह है कि इन विचारकों को ‘कवर’ सरकार से नहीं, बल्कि उस पाखंडी राजनीति से चाहिए जो इन्हें केवल अपनी बौद्धिक बहसों में मोहरे की तरह इस्तेमाल करती है।

काक-वाणी का अंतिम कौआ-कथ्य

तो निष्कर्ष यह है कि जब तक हमारे देश में यह छद्म उदारवादी गिरोह प्रगतिशीलता का ढोंग रचता रहेगा, तब तक सुधारकों को ‘कवर’ के नाम पर केवल खोखली सहानुभूति ही मिलेगी। कौम को सुधारने का झूठा ठेका लेने वालों, पहले खुद के पाखंड को तो सुधारो! गणतंत्र अपना काम बखूबी कर रहा है, आप भी जरा ‘वोट-मछली’ पकड़ने वाले इस सेक्युलर जाल से बाहर निकलिए और सच का सामना करना सीखिए।


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कागा जी