सुदूर कनकवन में एक विशाल बरगद का पेड़ था। उस पेड़ पर नीलकंठ नाम का एक बुद्धिमान तोता रहता था। उसी पेड़ की छांव में हिरण्यक नाम का एक भोला-भाला हिरण भी रहता था। दोनों में गहरी और अटूट मित्रता थी। वे दिनभर जंगल में घूमते, एक-दूसरे का सुख-दुख बांटते और शाम को वापस लौट आते। उनकी यह निस्वार्थ मित्रता पूरे जंगल में मिसाल बन चुकी थी।
एक कपटी प्रवेश और संदेह के बीज
एक दिन कनकवन में ‘कालिया’ नाम का एक चालाक और भूखा सियार आया। उसने हिरण्यक को देखा और उसके कोमल शरीर को देखकर उसके मुंह में पानी आ गया। लेकिन वह जानता था कि जब तक नीलकंठ उसके साथ है, वह हिरण्यक का शिकार नहीं कर सकता। कालिया ने अपनी मीठी बातों से हिरण्यक को फांसना शुरू किया। वह उसे रोज नए और हरे घास के मैदानों का लालच देने लगा।
जब नीलकंठ ने हिरण्यक को उस अनजान सियार के साथ देखा, तो उसने उसे चेतावनी दी, “मित्र हिरण्यक! अनजान लोगों पर इतनी जल्दी विश्वास नहीं करना चाहिए। सियार स्वभाव से कपटी होते हैं।” लेकिन हिरण्यक अपनी प्रशंसा और स्वादिष्ट घास के जाल में ऐसा फंसा कि उसे अपने सबसे पुराने मित्र की बात कड़वी लगने लगी। उसने नीलकंठ से कहा, “तुम केवल संदेह कर रहे हो, कालिया मेरा नया और अच्छा मित्र है।”
संकट का क्षण और विश्वासघात
एक सुबह, कालिया हिरण्यक को एक ऐसे खेत में ले गया जहाँ शिकारी ने जाल बिछा रखा था। जैसे ही हिरण्यक हरी घास चरने आगे बढ़ा, वह जाल में बुरी तरह फंस गया। हिरण्यक रोने लगा और कालिया से जाल काटने की गुहार लगाई। कपटी सियार मन ही मन खुश हुआ और बहाना बनाते हुए बोला, “आज मेरा उपवास है, मैं चमड़े के इस जाल को अपने दांतों से नहीं छू सकता। मैं कल सुबह आऊंगा।” यह कहकर वह पास की झाड़ियों में छिप गया ताकि हिरण्यक के मरने के बाद उसका मांस खा सके।
हिरण्यक को अपनी भूल का गहरा अहसास हो चुका था। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बह रहे थे। वह दर्द में चिल्लाया, “काश! मैंने अपने सच्चे मित्र नीलकंठ की बात मान ली होती।”
सच्ची मित्रता की विजय
शाम ढलने लगी थी। नीलकंठ अपने मित्र की तलाश में निकला। उड़ते-उड़ते उसने हिरण्यक को जाल में फंसा देखा। वह तुरंत नीचे उतरा। हिरण्यक ने रोते हुए अपनी गलती की माफी मांगी। नीलकंठ ने अपने मित्र को गले लगाया और कहा, “रो मत मित्र, मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा।” नीलकंठ ने तुरंत एक योजना बनाई। उसने कहा, “जैसे ही शिकारी आए, तुम मृत होने का नाटक करना और सांस रोक लेना। जब मैं सीटी बजाऊंगा, तुम तुरंत उठकर भाग जाना।”
अगली सुबह शिकारी आया। हिरण्यक को मृत समझकर उसने जैसे ही जाल हटाया, नीलकंठ ने जोर से सीटी बजाई। हिरण्यक बिजली की गति से भाग निकला। गुस्से में शिकारी ने अपना भारी डंडा फेंका, जो सीधे झाड़ियों में छिपे कालिया सियार को लगा और वह वहीं ढेर हो गया। हिरण्यक की जान बच गई थी और उसकी आँखों में अपने सच्चे मित्र के लिए असीम सम्मान था।
कहानी से सीख (Moral of the Story)
इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जो मित्र संकट के समय भी हमारा साथ नहीं छोड़ता, वही हमारा सच्चा हितैषी है। चापलूसों की मीठी बातों में आकर कभी भी अपने पुराने और सच्चे मित्रों पर संदेह नहीं करना चाहिए।