असली ‘मूल निवासी’ की खोज: जब सरकारी फाइलें तय करती हैं कि आप धरतीपुत्र हैं या केवल पर्यटक!

वाह! क्या गजब की बहस छिड़ी है। ‘द डिप्लोमैट’ अखबार ने आखिरकार उस दुखती रग पर हाथ रख दिया है, जिसे हमारे दोनों देशों के राजनेता सालों से सहला रहे हैं। मुद्दा यह है कि आखिर ‘मूल निवासी’ (Indigenous) कौन है? भारत और बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों और चतुर नेताओं को अचानक महसूस हुआ है कि जब तक किसी इंसान के माथे पर एक सरकारी और कानूनी ठप्पा न लग जाए कि ‘तुम यहीं के हो’, तब तक उसका वजूद ही अधूरा है। इतिहास की किताबों को ताक पर रखकर अब धूल खाती फाइलों में यह तय किया जा रहा है कि इस धरती का पहला बेटा कौन था।

नामकरण का महासंग्राम: आदिवासी बनाम वनवासी

भारत में तो यह खेल और भी निराला और मनोरंजक है। यहाँ सत्ता के गलियारों में, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके वैचारिक मित्रों के बीच, ‘आदिवासी’ शब्द से थोड़ी घबराहट महसूस होती है। क्योंकि ‘आदि’ का मतलब होता है जो सबसे पहले आया। अब अगर कोई पहले आ चुका था, तो बाकी लोग क्या बाद में ‘अतिथि’ बनकर आए थे? इस ऐतिहासिक असमंजस से बचने के लिए एक नया और सुरक्षित शब्द खोजा गया—’वनवासी’। यानी, आप मूल निवासी नहीं हैं, आप बस जंगल में रहने वाले लोग हैं। कितना आसान और जादुई है न? इतिहास के पन्नों को पलटने की जरूरत ही नहीं पड़ी, बस सरकारी डिक्शनरी बदल दी और अपनी राजनीतिक सुविधा का रास्ता साफ कर लिया!

बांग्लादेश का ‘उपजाति’ फॉर्मूला

अब जरा सीमा पार बांग्लादेश का हाल भी देख लीजिए। वहाँ की हुकूमत को ‘इंडिजिनस’ शब्द से ऐसा खौफ है जैसे किसी भ्रष्टाचारी को जाँच एजेंसी से होता है। वे वहाँ के चटगाँव पहाड़ी क्षेत्र के आदिवासियों को ‘मूल निवासी’ मानने के बजाय ‘उपजाति’ या ‘नृवंशीय समूह’ कहना पसंद करते हैं। तर्क बेहद सीधा है—अगर उन्हें ‘मूल निवासी’ मान लिया, तो संयुक्त राष्ट्र के नियमों के तहत उन्हें उनकी जल-जमीन पर अधिकार देने पड़ेंगे। भला कौन सा समझदार शासक कॉर्पोरेट मित्रों को फायदा पहुँचाने के बजाय असली हकदारों को उनका हक सौंपना चाहेगा?

काक-वाणी का अंतिम ज्ञान

काक-वाणी का स्पष्ट मानना है कि इस पूरे शाब्दिक ड्रामे में सबसे ज्यादा खुश हमारे चुनावजीवी राजनेता ही हैं। जब तक यह तय नहीं होता कि असली मूल निवासी कौन है और उसकी सटीक परिभाषा क्या है, तब तक चुनाव आते रहेंगे, रैलियाँ सजती रहेंगी और नए-नए वादे किए जाते रहेंगे। आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर अंततः किसका कब्जा होगा, यह तो बड़े-बड़े उद्योगपति ही तय करेंगे; हमारे प्यारे नेता जी तो बस यह तय करने में व्यस्त हैं कि आपको किस नाम से पुकार कर आपका कीमती वोट झटक लिया जाए।


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कागा जी