नमस्कार दोस्तों! स्वागत है आपका आपके पसंदीदा गलियारे ‘काक-वाणी’ में, जहाँ हम लाते हैं बॉलीवुड और मनोरंजन की दुनिया की चटपटी खबरें सीधे कौवे की पैनी नजर से। आज हमारी चोंच में फंसा है ‘thestatesman.com’ का एक बेहद गंभीर और गर्व से भर देने वाला लेख, जिसका टाइटल है – ‘Indian Cinema: The Way Forward to Global Glory’। अरे भाई, सीधे शब्दों में कहें तो- अपना सिनेमा अब सात समंदर पार डंका बजाने को पूरी तरह तैयार है!
नाटू-नाटू के स्टेप्स पर नाच रही है दुनिया
वह जमाना गया जब विदेशी लोग भारतीय फिल्मों का मतलब सिर्फ ‘पेड़ों के चारों तरफ चक्कर काटना और रोना-धोना’ समझते थे। अब तो लॉस एंजिल्स के थिएटर्स में जब ‘आरआरआर’ का ‘नाटू-नाटू’ बजता है, तो गोरे भी अपनी कमर मटकाने पर मजबूर हो जाते हैं। ‘द स्टेट्समैन’ की रिपोर्ट भी यही इशारा करती है कि भारतीय सिनेमा अब केवल ‘लोकल’ नहीं रहा, बल्कि यह एक तगड़ा ‘ग्लोबल’ ब्रांड बन चुका है। बाहुबली, दंगल और हाल ही में जवान और कल्कि जैसी फिल्मों ने साबित कर दिया है कि जब भारतीय कंटेंट अपनी असली ताकत पर आता है, तो हॉलीवुड के सुपरहीरोज भी बॉक्स ऑफिस पर पानी मांगते नजर आते हैं।
क्या है इस ‘ग्लोबल ग्लोरी’ का असली सीक्रेट मसाला?
अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर अचानक ऐसा क्या बदल गया? काक-वाणी की रिसर्च कहती है कि हमारा ‘लोकल तड़का’ ही हमारी सबसे बड़ी इंटरनेशनल ताकत बन गया है। जब तक हम हॉलीवुड की नकल करने की कोशिश कर रहे थे, हम पीछे थे। लेकिन जैसे ही हमने अपनी जड़ों, अपनी पौराणिक कथाओं और अपने हाई-ऑक्टेन इमोशनल ड्रामा को स्क्रीन पर उतारा, पूरी दुनिया हमारी दीवानी हो गई। ‘कांतारा’ जैसी फिल्में इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। विदेशी दर्शकों को अब वही घिसे-पिटे फॉर्मूले नहीं चाहिए, उन्हें चाहिए असली और अनोखा भारतीय फ्लेवर!
आगे का रास्ता: सिर्फ मसाला नहीं, मजबूत कहानी भी है जरूरी
लेकिन ठहरिए! ‘thestatesman.com’ की यह रिपोर्ट हमें एक जरूरी सीख भी देती है। ग्लोबल ग्लोरी का यह रास्ता इतना भी आसान नहीं है। अगर हमें ऑस्कर और कान्स जैसे मंचों पर लगातार राज करना है, तो हमें केवल बड़े बजट और भारी-भरकम वीएफएक्स (VFX) के भरोसे नहीं बैठना होगा। हमें अपनी ‘राइटिंग’ और ‘स्टोरीटेलिंग’ को और भी ज्यादा धारदार बनाना होगा। साथ ही, पायरेसी पर लगाम लगानी होगी और ग्लोबल डिस्ट्रीब्यूशन को मजबूत करना होगा।
तो दोस्तों, लब्बोलुआब यह है कि भारतीय सिनेमा का भविष्य बेहद सुनहरा और मसालेदार है। अब वह दिन दूर नहीं जब हॉलीवुड के बड़े-बड़े डायरेक्टर्स भी कहेंगे- “पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!” आपको क्या लगता है, क्या हमारा सिनेमा हॉलीवुड को पूरी तरह पछाड़ पाएगा? अपने विचार नीचे कमेंट में जरूर बताएं और काक-वाणी पढ़ते रहें!
संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें