आईएएस की ‘सीमित’ नौकरी से मुक्ति, अब देश सुधारने राजनीति के दलदल में उतरेंगी दिव्या मित्तल!

भारत में मोक्ष और असीम शक्ति प्राप्ति के दो ही मार्ग बताए गए हैं। पहला— सब कुछ त्यागकर हिमालय की कंदराओं में चले जाना, और दूसरा— आईएएस की ‘छोटी-मोटी’ नौकरी छोड़कर राजनीति के महासागर में गोता लगा देना। उत्तर प्रदेश की चर्चित पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने बेहद समझदारी दिखाते हुए दूसरे मार्ग का चयन किया है। आखिर देश सेवा का असली आनंद सरकारी फाइलों के पीले पन्नों में दबे रहने में कहां? असली मजा तो तब है जब नियम-कानून खुद आपके इशारों पर मुजरा करें!

जनसेवा का असली ‘शॉर्टकट’ – राजनीति

आईएएस की नौकरी में सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां आपको ‘प्रोटोकॉल’ और ‘संविधान’ नाम की चिड़िया का ध्यान रखना पड़ता है। जनता की सेवा करने जाओ, तो बजट का रोना और विपक्ष का हंगामा झेलना पड़ता है। लेकिन राजनीति? आह! यहां न कोई ट्रांसफर का डर है, न किसी मंत्री की घुड़की का। यहां तो आप खुद ही ‘सिस्टम’ बन जाते हैं। ‘काक-वाणी’ के विशेष सूत्रों के अनुसार, दिव्या जी ने आखिरकार यह समझ लिया कि जनता के आंसू पोछने के लिए सरकारी रूमाल से कहीं ज्यादा असरदार चुनावी वादों का रेशमी दुपट्टा होता है। आखिर, यूपीएससी की देश की सबसे कठिन परीक्षा पास करने का असली चरम तो चुनाव की जनसभा में माइक थामकर ‘भाइयों और बहनों’ चिल्लाने में ही है!

लाल बत्ती छूटी तो क्या, सफेद कुर्ता तो है!

राजनीति के विश्लेषक इस ऐतिहासिक कदम से बेहद गदगद हैं। अब तक दिव्या जी अपनी ईमानदारी और कड़क मिजाज के लिए जानी जाती थीं, लेकिन अब उन्हें राजनीति की ‘फ्लेक्सिबिलिटी’ सीखनी होगी। सबसे बड़ा सस्पेंस तो यह है कि वह किस दल का दामन थामेंगी? हालांकि, भारतीय राजनीति में ‘विचारधारा’ तो मौसम की तरह बदलती रहती है, इसलिए पार्टी कोई भी हो, मकसद तो एक ही है— परम जनसेवा (और थोड़ी-बहुत स्व-सेवा)। आईएएस रहते हुए जो काम वह सालों की मेहनत के बाद भी लालफीताशाही के कारण नहीं कर पाईं, नेता बनकर वह उसे सिर्फ एक चुनावी भाषण में चुटकी बजाकर पूरा कर देंगी, ऐसा हमारा और इस देश की भोली जनता का अटूट विश्वास है।

हम दिव्या जी के इस साहसिक फैसले का स्वागत करते हैं। वातानुकूलित दफ्तरों की ठंडी हवा को छोड़कर चुनावी रैलियों की धूल और पसीने को गले लगाना हर किसी के बस की बात नहीं होती। राजनीति के इस सुंदर कीचड़ में आपका स्वागत है, जहां कमल भी खिलते हैं, हाथ भी साफ होते हैं और साइकिल की रफ्तार भी तय होती है। उम्मीद है कि आप अपनी पुरानी प्रशासनिक आदतों को भूलकर जल्द ही एक आदर्श नेता की तरह ‘सफेद झूठ’ बोलने की कला में महारत हासिल कर लेंगी!


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कागा जी