बहुत समय पहले की बात है, गोमती नदी के किनारे एक वृद्ध महिला अपनी छोटी सी झोपड़ी में अकेले रहती थी। उसका नाम यशोदा था। वह दिन भर रंग-बिरंगे कागज़ के छोटे-छोटे दीये बनाती और जैसे ही शाम ढलती, वह उन दीयों में बाती लगाकर नदी के बहते जल में तैरा देती थी। गांव के लोग अक्सर उसे देखकर हंसते थे और उसे पागल समझते थे, क्योंकि कागज़ के दीये पानी की लहरों में मिलते ही कुछ ही पलों में गलकर डूब जाते थे।
धनी सेठ का अहंकार और वृद्धा का उत्तर
एक दिन उस राज्य का सबसे धनी और घमंडी सेठ, धनपत राय, उसी नदी के किनारे से गुजर रहा था। उसने वृद्धा को जल में दीये बहाते देखा। सेठ रुक गया और उपहास उड़ाते हुए बोला, “हे वृद्धा! तुम कितनी मूर्ख हो। दिन भर पसीना बहाकर ये कागज़ के दीये बनाती हो, जो पानी में जाते ही नष्ट हो जाते हैं। तुम्हारी इस व्यर्थ की मेहनत का क्या लाभ? देखो मुझे, मेरे पास अपार धन-दौलत है जो कभी नष्ट नहीं हो सकती।”
वृद्धा ने शांत भाव से सेठ को देखा, मुस्कुराई और बोली, “सेठ जी! आप जिसे मेरी मूर्खता कह रहे हैं, वह वास्तव में इस जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है। क्या आप इस बहती नदी और इस दीये का रहस्य जानते हैं?”
कागज़ के दीये का गहरा संदेश
वृद्धा ने एक जलता हुआ कागज़ का दीया पानी में छोड़ा। दीया लहरों पर तैरता हुआ कुछ दूर तक अंधेरे को चीरता रहा और फिर धीरे-धीरे जल में समा गया। वृद्धा अत्यंत भावुक स्वर में बोली, “सेठ जी, हमारा यह शरीर और हमारा अहंकार भी इस कागज़ के दीये की तरह ही है। जीवन भर इंसान धन, संपत्ति और पद एकत्र करने में लगा रहता है, लेकिन मृत्यु रूपी काल की नदी के सामने सब कुछ इस कागज़ की तरह गलकर समाप्त हो जाता है।”
सेठ धनपत राय वृद्धा के इन शब्दों को सुनकर स्तब्ध रह गया। वृद्धा ने आगे कहा, “जब यह दीया डूबता है, तो इसका कागज़ नष्ट हो जाता है, लेकिन जलने तक उसने जो प्रकाश फैलाया, वह आसपास के अंधेरे को मिटा देता है। ठीक वैसे ही, इंसान की संपत्ति यहीं रह जाती है, लेकिन उसका प्रेम, उसकी दया और उसके अच्छे कर्मों का प्रकाश अमर रहता है।”
अहंकार का अंत और जीवन का सत्य
वृद्धा की यह बात सेठ के हृदय में गहराई तक उतर गई। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली। उसे अहसास हुआ कि उसने जीवन भर केवल धन जमा किया, लेकिन किसी भूखे या दुखी के जीवन में कभी खुशी का प्रकाश नहीं फैलाया। सेठ ने वृद्धा के चरण स्पर्श किए और जीवन को एक नई दिशा देने का संकल्प लिया।
कहानी की सीख
सीख: यह जीवन का सच बताने वाली लोककथा हमें सिखाती है कि धन, वैभव और रूप का अहंकार व्यर्थ है क्योंकि यह सब नश्वर है। इंसान के जाने के बाद केवल उसके कर्म, उसका प्रेम और उसकी सहहृदयता ही याद रखी जाती है। इसलिए जीवन में केवल संग्रह न करें, बल्कि दूसरों के जीवन में अच्छाई का प्रकाश फैलाएं।