अरे भाई, दुनिया में कुछ भी हो जाए, लेकिन बीबीसी के चश्मे का नंबर कभी नहीं बदलता। हाल ही में जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो साहब भारत के एक बंदरगाह वाले शहर में पधारे, तो पूरी दुनिया को लगा कि शायद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को आंखें दिखाने या व्यापारिक सौदेबाजी के लिए यह दौरा हुआ होगा। लेकिन धन्य हो बीबीसी की दिव्य दृष्टि! उन्होंने तुरंत एक खोजी हेडलाइन चमका दी—क्या रुबियो जी को ‘घरेलू दबाव’ के कारण भारत के एक बंदरगाह शहर का दौरा करना पड़ा?
विदेशी मेहमान और बीबीसी की ‘अनोखी’ दूरबीन
वाह! क्या बात है! काक-वाणी के स्तंभकार तो यह सोच-सोचकर चक्कर में पड़ गए हैं कि वाशिंगटन के किस ‘घरेलू दबाव’ ने रुबियो साहब को मजबूर कर दिया? क्या अमेरिकी जनता ने सड़कों पर उतरकर नारे लगाए थे कि जब तक मार्को रुबियो भारत के किसी पोर्ट पर जाकर ताजी समुद्री हवा नहीं खाएंगे, तब तक हम टैक्स नहीं देंगे? या फिर अमेरिका में ताजे नारियल पानी का भारी अकाल पड़ गया था और रुबियो साहब को अपनी घरेलू जिम्मेदारियां निभाने के लिए भारत के तटीय शहर की शरण लेनी पड़ी?
पश्चिमी मीडिया की यह पुरानी और महान परंपरा रही है। भारत में अगर कोई बड़ा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हो जाए, तो इन्हें उसमें ‘राजनीतिक एजेंडा’ दिखता है। और अगर कोई अमेरिकी नेता भारत के किसी शहर में एक कप चाय भी पी ले, तो उसमें इन्हें अमेरिकी घरेलू राजनीति का ‘अंतर्राष्ट्रीय संकट’ नजर आने लगता है। बीबीसी के ज्ञानियों को कौन समझाए कि दुनिया अब केवल वाशिंगटन या लंदन की धुरी पर नहीं घूमती।
समुद्र का किनारा और वाशिंगटन का पारा
अगर मार्को रुबियो किसी भारतीय बंदरगाह पर खड़े होकर जहाजों की आवाजाही देख रहे हैं, तो इसका सीधा सा मतलब यह भी हो सकता है कि वे भारत की उभरती समुद्री ताकत और आर्थिक दबदबे को अपनी आंखों से आंकने आए हैं। लेकिन नहीं, साहब को तो हर बात में वाशिंगटन का ‘ड्रामा’ ढूँढना है। ऐसा लगता है जैसे रुबियो साहब का वीजा आवेदन स्वीकृत होते ही बीबीसी के दफ्तर में हलचल मच गई होगी कि आखिर एक अमेरिकी नेता भारत के किसी साधारण से बंदरगाह पर कैसे जा सकता है? जरूर दाल में कुछ काला है!
खैर, हम तो बीबीसी के इस महान और क्रांतिकारी पत्रकारिता अनुसंधान को साष्टांग प्रणाम करते हैं। हमें तो डर है कि अगली बार जब कोई अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आकर ताजमहल देखेगा, तो बीबीसी शायद हेडलाइन छापेगा—’क्या अमेरिका में प्रॉपर्टी के दाम बढ़ने के कारण राष्ट्रपति को संगमरमर का मकान देखने भारत भागना पड़ा?’ जय हो ऐसी अद्भूत और अकल्पनीय पत्रकारिता की!
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