टाइम मैगजीन का मुफ़्त ज्ञान: गोरे बाबुओं की ‘काँव-काँव’ और भारत की क्षमता

अरे वाह! न्यू यॉर्क के वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर समोसे की जगह बर्गर चबाने वाले ‘टाइम मैगजीन’ के ज्ञानियों को अचानक भारत की स्टेट कैपेसिटी यानी सरकारी क्षमता की चिंता सताने लगी है। उनका नया फरमान आया है कि जब तक भारत अपनी सरकारी क्षमता नहीं बढ़ाएगा, तब तक उसका विकास एक भ्रम ही रहेगा। ‘काक-वाणी’ के मंच से हम इन विदेशी ज्योतिषियों की इस असीम कृपा का सहर्ष स्वागत करते हैं। आखिर बिना मांगे ज्ञान बांटने में पश्चिमी मीडिया का कोई मुकाबला नहीं है।

सड़क का गड्ढा या अमरीकी चश्मा?

इन विदेशी पत्रकारों को कौन समझाए कि हमारे देश में ‘स्टेट कैपेसिटी’ की असली परीक्षा जीडीपी के आंकड़ों से नहीं, बल्कि पहली बारिश के बाद सड़क पर बने गड्ढों से होती है! टाइम मैगजीन वालों को लगता है कि अगर नरेंद्र मोदी सरकार ने कागजों पर फाइलें तेजी से दौड़ा दीं, तो बस देश रातों-रात महान बन गया। उन्हें क्या पता कि हमारे यहाँ एक छोटी सी पेंशन की फाइल को सरकारी दफ्तर की चौखट पार करने में उतने ही जन्म लगते हैं जितने आत्मा को मोक्ष प्राप्ति में!

हमारे बाबू लोग इतनी जल्दी में काम करके अपनी सदियों पुरानी ‘लंच के बाद आना’ वाली समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को नष्ट कैसे कर सकते हैं? क्या टाइम मैगजीन इस चाय-पानी वाली क्षमता का मूल्यांकन कर सकती है? बिल्कुल नहीं!

डिजिटल इंडिया बनाम ढीला प्रशासन

पश्चिमी मीडिया की सबसे बड़ी त्रासदी यही है। उन्हें भारत में सड़कों पर दौड़ती 5G टेक्नोलॉजी तो दिखती है, लेकिन उस 5G की स्पीड से चलने वाली राजनीति नहीं दिखती। वे कहते हैं कि भारत की संस्थाएं प्रशासनिक रूप से कमजोर हैं। अरे साहब, जो प्रशासन चुनाव के मौसम में नेताओं के एक इशारे पर विरोधी नेताओं के घर रेड मारने के लिए दिन-रात एक कर दे, उस प्रशासन को आप कमजोर कैसे कह सकते हैं? क्षमता की कोई कमी नहीं है, बस क्षमता का सही इस्तेमाल सही समय पर होता है।

विपक्ष इस रिपोर्ट को पढ़कर बेहद गदगद है। राहुल गांधी और उनके सहयोगी सोच रहे होंगे कि टाइम मैगजीन ने सत्ताधारी पार्टी का रिपोर्ट कार्ड फाड़ दिया है। वहीं दूसरी तरफ, सत्ता पक्ष इसे भारत को बदनाम करने की अंतरराष्ट्रीय ‘जॉर्ज सोरोस मार्का’ साजिश घोषित करने में जुट गया है।

काक-वाणी का अंतिम फैसला

संक्षेप में कहें तो, टाइम मैगजीन के गोरे साहबों, थोड़ा सब्र रखो। हमारे यहाँ सरकारी फाइलें भले ही कछुए की चाल से चलती हैं, लेकिन चुनावी रैलियाँ और वादे सुपरसोनिक मिसाइल की गति से भागते हैं। जब तक देश में नेताओं के भाषणों की क्षमता और जनता के सहनशीलता की क्षमता बरकरार है, तब तक इस ‘स्टेट कैपेसिटी’ का हम क्या अचार डालेंगे?


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कागा जी