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आत्मा की ऊँचाई हर मनुष्य अपनी आराधना के अनुसार अनेक

Title: आत्मा की ऊँचाई

हर मनुष्य अपनी आराधना के अनुसार अनेक धर्मों में विश्वास रखता है। परंतु ये सभी धर्म एक ही मंदिर की तरह होते हैं जिसकी आत्मा अधिक ऊंची होती है। ये ज्ञान, ध्यान और अनुभव के रथ पर चलना होता है।

वेद और उपनिषदों में जिसके ज्ञान का वर्णन किया गया है, वह हमारी आत्मा है। इसकी ऊंचाई या गहराई न सिर्फ समझ पाना बल्कि समझाना भी बेहद मुश्किल है। हमारी आत्मा जीवन की उच्चतम शिखरों को छुए बिना रह नहीं सकती है।

जीवन के सभी मोड़ों पर एक ऐसी स्थिति आती है जब हम आत्मा के प्रति ध्यान केंद्रित करते हैं। ये ऐसी स्थिति होती है जब हम अपने आप से कुछ और नहीं मांगते, जब हमारी प्रचंड इच्छाएँ, अहंकार या बुराई बिखर चुके होते हैं। तभी हम अपने आप में लोगों से मुक्त होते हैं और अपने आत्मा की ऊंचाई पर चढ़ते हैं।

हमारी आत्मा श्रेष्ठ ज्ञानमयी वस्तु है। वह सब जानती है, सब समझती है और सबका अनुसरण करती है। जो लोग अपनी आत्मा से जुड़ते हैं, वे जीवन में असीमित सुख-शांति के साथ कामयाब होते हैं।

जिस दिन हम अपनी आत्मा के पास पहुंचते हैं, उस दिन हमारा जीवन एक नई ऊंचाई पर पहुंच जाता है। जब हम अपनी आत्मा से मिलते हैं, तो हम समानता, सामंजस्य, शांति और प्रेम जैसे गुणों से परिपूर्ण हो जाते हैं। इसलिए, इस लम्बी यात्रा में, हमें अपनी आत्मा के अधीन होना चाहिए।

अगर हम अपनी आत्मा के द्वारा संयमित रहते हैं, तो हम जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। सफलता न केवल सामाजिक या आर्थिक अवसरों में होती है, बल्कि हम जीवन में उबशियों जैसे बिक्षुकों, असाधारण हल्के व्यवहार वाले पुरुष या विद्युत के बिना जीवन गुजार सकते हैं।

हमें अपनी जड़ में से निकलकर अपनी आत्मा के समृद्ध जीवन को जीना होगा। और ये समृद्ध जीवन बस इस बात पर नहीं होगा कि हम कितनी धनवान हैं, आईना, या टीवी से लड़कियों को कैसे अपने करीब लाते हैं। ये समृद्ध जीवन हमारी आत्मा के आत्मविश्वास, आत्मविश्राम, आत्मसंवाद और आत्मयात्रा के आधार पर होगा।

“जिस ‘आत्मा’ से हम जुड़ जाते हैं, उस आत्मा को हम नहीं छोड़ते।” – श्रीमद भागवत गीता

यही हम सब लक्ष्य होना चाहिए। हमें अपनी ही जड़ में से निकलकर, अपनी आत्मा की ऊंचाई पर पहुंचते हुए जीवन की असीमित सुख-शांति और आत्म निर्भरता का उच्च अनुभव होना चाहिए।

आखिरकार, त्याग, सेवा और साधना के माध्यम से हम अपनी आत्मा की ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं। जब हम इन तीनों में धन्य होते हैं, तो हम अपने जीवन की सफलता के लिए बड़े आदर्श होते हैं।

“आत्मा को जानो। अपने आपको जानो। हर्म के लिए न हो, इसे कर्म कहते हैं।” – स्वामी विवेकानंद

कर्म, सेवा, श्रद्धा और उत्साह के साथ, हम अपने मौलिक स्वार्थ अर्थात आत्मा को जानते हुए स्वस्थ एवं स्पिरिचुअल स्वरूप में जीवन निर्वाह कर सकते हैं।

आखिरकार, हमारी आत्मा भूमि में किसी अन्य लक्ष्य से जीवन निर्वाह नहीं करती, बल्कि यह हमेशा अन्य योगों की तुलना में ऊंची होती है। हमें इसे जानना चाहिए और इसे प्राप्त करने के लिए कठिन संघर्ष की भूमिका निभाना चाहिए।

“मुझे ‘आत्मा’ से मिलाओ फिर मैं तुम्हें उसी रूप में मिलूंगा कुछ और नहीं।” – गौतम बुद्ध

अगर हम अपनी आत्मा से मिल जाते हैं, तो हम अपनी ऊंचाई पर होते हुए इस संसार में एक अलग ही मंजिल को पहुंचते हुए देखेंगे। इस ऊंचाई पर हमें एक अद्भुत जीवन आनंद मिलता है जो हमेशा याद रहता है।

कागा जी

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