बॉलीवुड के ‘सिंघम’ यानी Ajay Devgn जब भी कुछ बोलते हैं, तो बात सीधे निशाने पर लगती है। हाल ही में मुंबई में आयोजित हुए FICCI Frames 2026 के मंच से अजय देवगन ने एक ऐसी कड़वी सच्चाई बयां की है, जिसने फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर्स से लेकर डायरेक्टर्स तक को सोचने पर मजबूर कर दिया है। ‘काक-वाणी’ की इस खास रिपोर्ट में जानिए कि आखिर क्यों अजय देवगन को हिंदी फिल्में बनाना दुनिया का सबसे मुश्किल काम लग रहा है।
रीजनल और इंटरनेशनल सिनेमा से भी कठिन है बॉलीवुड!
अजय देवगन ने मंच से साफ शब्दों में कहा कि आज के दौर में एक हिंदी फिल्म बनाना, रीजनल (क्षेत्रीय) या इंटरनेशनल सिनेमा बनाने से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है। उनका कहना है, “जब आप एक रीजनल फिल्म बनाते हैं, तो आपको पता होता है कि आपके दर्शक कौन हैं और उनकी सांस्कृतिक पसंद क्या है। जब आप इंटरनेशनल सिनेमा बनाते हैं, तो आपका एक खास टारगेट ग्रुप होता है। लेकिन हिंदी सिनेमा के साथ ऐसा नहीं है।”
“हमें पता ही नहीं कि हमारा दर्शक कौन है”
अजय देवगन ने बॉलीवुड की सबसे दुखती रग पर हाथ रखते हुए कहा कि हिंदी फिल्मों के लिए ‘टारगेट ऑडियंस’ तय करना सबसे बड़ा सिरदर्द है। उत्तर भारत के सिंगल स्क्रीन दर्शकों की पसंद, महानगरों के मल्टीप्लेक्स दर्शकों से बिल्कुल अलग होती है। एक ही फिल्म से उत्तर प्रदेश के गांव के दर्शक को भी खुश करना है और मुंबई-दिल्ली के पॉश इलाके के दर्शकों को भी। इस भयंकर डाइवर्सिटी के कारण मेकर्स अक्सर उलझ कर रह जाते हैं कि आखिर कैसी फिल्म बनाई जाए जो सबको पसंद आए।
काक-वाणी की नजर से: क्या वाकई सिंघम की बात में दम है?
देखा जाए तो Ajay Devgn की इस बात में सौ टका सच्चाई है। हाल के वर्षों में हमने देखा है कि कैसे कई बड़े बजट की हिंदी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी हैं, क्योंकि वे दर्शकों की नब्ज नहीं पकड़ पाईं। वहीं दूसरी ओर, रीजनल सिनेमा अपनी मिट्टी से जुड़ी कहानियों के दम पर लगातार बाजी मार रहा है।
अजय देवगन का यह बयान उन सभी फिल्म निर्माताओं के लिए एक वेक-अप कॉल है जो बिना ऑडियंस रिसर्च के सिर्फ ‘स्टार पावर’ के दम पर फिल्में बना रहे हैं। अब देखना यह है कि अजय की इस खरी-खरी सलाह को बॉलीवुड के बाकी मेकर्स कितनी गंभीरता से लेते हैं!
संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें