Title: बचपन का दोस्त
अभिषेक एक बहुत ही मेहनती और मेधावी छात्र था। वह अपनी पढ़ाई में लगा रहता था और अपने माता-पिता की उम्मीदों को पूरा करने के लिए हमेशा ही संघर्ष करता रहता था। वह अपने रेहरसल में एक बहुत ही समझदार और मेहनती छात्र था और हमेशा सफलता की तलाश में था।
अभिषेक के घर के सामने एक नन्हा सा बच्चा रहता था जिसका नाम विशाल था। विशाल भी एक बहुत ही मसुम और प्यारा बच्चा था। वह हमेशा अभिषेक के बारे में सोचता रहता था और उसे अपना सच्चा दोस्त मानता था।
एक दिन अभिषेक को स्कूल से लौटते समय विशाल ने उसे आकर्षित करने के लिए कुछ उत्तेजित किया। उसने उसे अपने साथ होमवर्क करने के लिए आमंत्रित किया। अभिषेक पहले शुरू में इसे नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की, लेकिन वह जल्द ही समझ गया कि विशाल उसके बचपन का सच्चा दोस्त है और उसे कभी नहीं छोड़ेगा।
बचपन से ही अभिषेक और विशाल दोनों एक-दूसरे की दोस्त होते रहे हैं। दोनों हमेशा मिलकर खेलते थे और एक-दूसरे की समस्याओं में आकर उन्हें हल करते थे। लेकिन जब अभिषेक इंटर क्लास के दौरान थोड़ा समय के लिए गांव चला गया था, तो उसे विशाल के साथ छोड़ना पड़ा। अभिषेक थोड़ा उदास था क्योंकि वह अपने सबसे पुराने और सबसे अच्छे दोस्त से दूर था।
अभिषेक के गांव में उसकी ननी रहती थी जो उसे बहुत प्यार करती थी। उसने अभिषेक को खूब रसोईघर में मदद करने का काम दिया जो उसे बहुत पसंद नहीं था। उसके पास खेलने के लिए कोई साथी नहीं था जो उसे उसकी कमी की याद दिला रहा था।
इसी समय विशाल के बचपन के दोस्त अभिषेक की बेहतरीन यादें दूर होने के कारण उसे बड़ा उदास कर रही थीं। वह चाहता था कि अभिषेक शीघ्र ही वापस आ जाएँ और फिर से उसके साथ खेलें और मस्ती करें।
एक दिन विशाल ने अपनी माँ से अभिषेक की बारे में बताया। वह उसे बताने लगी कि अभिषेक उसका सच्चा दोस्त है, और उसे इतना याद करता है कि वह उसे देखने के लिए अपने गांव तक जाना चाहता है।
विशाल की मां उसे समझाती रहीं कि दोस्त तो हमेशा हमारे साथ होते हैं, और अभिषेक आते ही हम उनसे मिलेंगे।
विशाल इस बात से खुश नहीं था और वह कुछ इस तरह सोचता हुआ सो गया कि उसे एक ख्वाब में एक नन्हे से दिव्य आलोक ने आवाज़ दी जो उसे याद रखने के लिए कहती हैं स्वयं को खुश रखो।
अभिषेक वापस लौट कर अपने दोस्त विशाल से मिलने के लिए उसके घर गया था। विशाल की माँ ने उसे संध्या का खाना खिलाया जहाँ विशाल भी उसे देख रहा था।
फिर अभिषेक ने एक बड़े से बैग से एक नन्हे से तोहफे का उपहार निकाला। वह वहाँ खड़े लोगों के सामने यह नहीं बताना चाहता था कि वह अभी-अभी उत्तराखंड से लौट रहा था, लेकिन यह निश्चित था कि इसे सबसे अच्छा समझाने के बाद उस बैग में कुछ प्रतिस्पर्धात्मक उत्तोलक हुआ।
विशाल भी उसे समझ गया कि उस बैग में खेलने के लिए सामान होगा और उसने उम्मीद से लाल रंग का दोती हुआ कहा, “आपका तो मेरे पास कुछ नहीं है, लेकिन मैंने फिर से आपको मेरा दोस्त माना।”
अभिषेक ने इस तरह से विशाल के दिल को जीत लिया और यह निश्चित करता है कि अगले बार जब वह इस छोटे गांव में आएगा, तो वह अपने दोस्त विशाल से जरूर मिलेगा।
विशाल और अभिषेक की दोस्ती दिनों बाद अटूट बन गयी थी और वह दोनों हमेशा एक-दूसरे का साथ देने के लिए तैयार रहते थे। वह दोनों अपने जीवन में अगले चरण में आगे बढ़ते रहे और उन्होंने अपने दोस्ती को हमेशा याद रखा।