Title | राहत का फैसला | Decision of Relief
एक गरीब व्यक्ति ने अपनी साधनों के साथ सुबह की एक यात्रा शुरू की। उसका लक्ष्य नगर के मंदिर था। रास्ते में, वह एक वन में गुम हो गया था। एक गुमसुम स्थिति में, वह यमुना नदी के किनारे खड़ा हो गया। दोनों तरफ बहुत सारे बंदर थे जो उसे अपने पास आने नहीं दे रहे थे।
धीरे-धीरे, साधुओं की भीड़ उसी जगह चली गई जहां वह था। दो साधु देखी गई, एक बड़ा आदमी और दूसरा छोटा आदमी। छोटे साधु ने उसे सम्मान दिया, जबकि बड़े साधु ने कुछ नहीं कहा।
बड़े साधु ने अपने दोनों हाथों को बंद करके उसे साथ लगाकर उसके जीवन का असली अर्थ और मकसद जानने की प्रार्थना की। कुछ ही देर के बाद, छोटा साधु उसे अपनी पोथी दे देता है जिसमें गुरु मार्ग बताया गया है।
वह पाठक था, और उस पत्रिका में कुछ उद्धचक्कित करने वाला हमेशा से था। वह बहुत जल्द ही समाप्त हो जाता था, तो उसने साधु से पूछा अगला स्टेशन कहां था। साधु ने बताया कि उस स्थान पर एक महात्मा हैं।
उसके पते का जिक्र करते हुए छोटे संत को नमस्ते कहकर साधु से विदा लिया।
उसने वहां पहुँचते ही धनंजय नाम के आदमी से मुलाकात की। उसने छोटा संत बताया कि उसे एक अकेली मां हैं जिन्हें बेहद तकलीफ है और जो अपने स्वास्थ्य का लगातार ध्यान रख पाने में सक्षम नहीं हैं।
धनंजय नाम का आदमी उसे एक बुद्धिमान फैसले के बारे में सुझाव देता है। उसने सलाह दी कि उसे रोहतक में अपनी गाड़ी बेच देनी चाहिए और उसके पैसों का इस्तेमाल अपनी मां के उपचार के लिए करना चाहिए।
छोटा संत ने उसे यह सलाह दी कि यह फैसला ध्यान से लिया जाए।
मुश्किलों और तकलीफों से घिरे धनंजय को उस स्थिति से निकलने के लिए उपस्थित संतों का सहारा उसे सही राह दिखाई।
सोचते-सोचते, धनंजय ने संत से बातचीत की और उसे इस घोर शोक की स्थिति से बचाने के लिए एक उपाय सुझाया। धनंजय ने संत को अपने साथ रखा और अपने घर में रहने के लिए उसे बोला।
उस घर में छोटा संत बहुतजल्द इस परिवार के अंग हो गया। वह इस परिवार से प्यार करनी लगा था और उसके माता-पिता पर भी बहुत प्रभाव पड़ रहा था।
छोटा संत ने बेची हुई गाड़ी से जमा किये गए पैसों का उपयोग एक महीने के दौरान धनंजय की मां के उपचार के लिए किया। वह अपने प्रबंधकों के साथ मुलाकातों में जाता था जो एक बड़े विमान कंपनी के एक कामकाजी स्थान के प्रबंधक थे।
वह जानता था कि आने वाली कई मुश्किलें उसे फिर से निष्पादित करेंगी। लेकिन वह इस दुनिया में थायी रूप से स्थापित हो गया था कि उसकी सहायता किसी और चीज द्वारा नहीं होने वाली है।
उसको लगा कि इस चुनौती के सामने खड़े होना ही उसकी जिंदगी के लिए बहुत ज्यादा ज़रूरी है। उसने सोचा कि उसे अपने बच्चे और उनपर ध्यान देते हुए अधिक पैसे कमाने की जरूरत है।
उसने फिर से बड़ी से बड़ी मुश्किल को सामने देखा और गुमराह हो गया कि यह समस्या कैसे हल होगी। धनंजय ने मंजिल तक पहुंचने के लिए अपनी महँगी गाड़ी बेच दी थी, जो सभी लोग म्रामर्ग में होने के कारण उसे नहीं खरीद सकते थे।
उसने संत से संपर्क किया जो उसे अपने उत्तर उत्तरदायित्वों के साथ रखता था। धनंजय ने संत से कहा कि वह ईश्वर का आभारी है।
उसने इससे पहले कभी इसे लोगों के साथ साझेदार नहीं किया था, लेकिन इस उत्तरदायित्व के वजह से वह साझेदारी में आगया। उसकी साझेदारी से पहले, वह स्वयं अपनी जिम्मेदारियों से निपटता था।
आखिरकार, इस दुनिया के साथ साझेदारी करने का फैसला लेना उसने अपने जीवन में एक बड़ा अद्भुत बदलाव लाया।
इसी फैसले के अनुसार, धनंजय अब अपने करियर पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। अधिक पैसे के माध्यम से, उसकी मां के आराम से जुड़े सभी खर्चों को आरामदायक बनाने के लिए वह अधिकाधिक काम करता रह रहा है।
यह हमेशा से सबका अधिकार होना चाहिए कि उन्हें अपने जीवन के असली मसले को बिना किसी क्षति के बाहर दिखाने की आवश्यकता होती है।