नमस्कार प्रिय पाठकों! ‘काक-वाणी’ के ‘WhatsApp University’ विभाग में आपका हार्दिक स्वागत है। आज हम उस महान डिजिटल विश्वविद्यालय की बात करेंगे, जहां के प्रोफेसर और डीन आपके अपने सगे संबंधी हैं। इनका एकमात्र शोध उपकरण है—अंगूठे का सही इस्तेमाल और ‘फॉरवर्डेड मेनी टाइम्स’ का जादुई टैग। इस विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां तथ्यों की बलि चढ़ाकर अंधविश्वास की पूजा की जाती है। आइए, इस हफ्ते के कुछ ‘नोबेल पुरस्कार’ विजेता दावों की पोल खोलते हैं।
यूनेस्को का वो ‘अंतिम’ फैसला जो कभी हुआ ही नहीं
क्या आपको याद है कि पिछले हफ्ते यूनेस्को (UNESCO) ने एक बार फिर हमारी किसी चीज को दुनिया का ‘सर्वश्रेष्ठ’ घोषित किया था? पिछले पांच वर्षों में, यूनेस्को ने हमारे राष्ट्रगान, हमारी मुद्रा, हमारे त्योहारों और यहां तक कि हमारे पड़ोस के शर्मा जी के कुत्ते को भी दुनिया का सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दिया है—कम से कम आपके पारिवारिक ग्रुप के अनुसार तो यही सच है। यूनेस्को के पेरिस मुख्यालय में बैठे अधिकारी शायद अपनी सारी वैश्विक विरासत वाली फाइलें बंद करके केवल भारतीय WhatsApp ग्रुपों के संदेशों को सत्यापित करने में ही व्यस्त हैं। सच्चाई यह है कि यूनेस्को को खुद नहीं पता कि उसने कब ये सारे प्रमाण पत्र बांट दिए!
गर्म पानी, नींबू और कैंसर का ‘अचूक’ घरेलू इलाज
अब बात करते हैं चिकित्सा जगत के उस क्रांतिकारी आविष्कार की, जिसने दुनिया भर के कैंसर रिसर्च सेंटरों में ताला लगवाने की ठान ली है। आपके इनबॉक्स में घूमता एक मैसेज दावा करता है: “सुबह खाली पेट गर्म पानी में नींबू निचोड़कर पीने से कैंसर कोशिकाएं तुरंत मर जाती हैं।” इस संदेश को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है जैसे मेडिकल साइंस की पढ़ाई करने वाले छात्र पांच साल तक केवल समोसे तलना सीख रहे थे। असली ज्ञान तो उस ‘अल्ट्रा-लेवल’ के एडमिन के पास है, जिसने नींबू को कैंसर रोधी मिसाइल बना दिया। फैक्ट यह है कि नींबू पानी पीना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, लेकिन यह कैंसर का इलाज कतई नहीं है।
फैक्ट-चेक: जब विज्ञान ने सिर पकड़ लिया
इस यूनिवर्सिटी में नासा (NASA) भी रोज सुबह आकर अपनी हाजिरी लगाता है। कभी नासा अंतरिक्ष से दीवाली की अद्भुत तस्वीरें भेजता है, तो कभी दावा करता है कि शंख बजाने से ब्रह्मांड के सारे बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं। इन सभी दावों का सच केवल इतना है कि इन्हें लिखने वाले खाली दिमाग के लोग होते हैं, और शेयर करने वाले अति-उत्साही देशभक्त या डरे हुए नागरिक। सत्य और तथ्य तो बेचारे कोने में बैठकर आंसू बहा रहे हैं, जबकि ‘फॉरवर्ड’ की गई अफ़वाहें पूरे देश का भ्रमण कर रही हैं। अगली बार जब ऐसा कोई मैसेज आए, तो अपनी उंगलियों को थोड़ा आराम दें और फॉरवर्ड करने से पहले अपनी अक्ल का इस्तेमाल करें!