प्रणाम ज्ञानियों! ‘काक-वाणी’ के इस विशेष अंक में आपका स्वागत है। आज हम बात करेंगे दुनिया के उस सबसे बड़े विश्वविद्यालय की, जिसके कुलपतियों की संख्या हमारे देश की जनसंख्या से भी अधिक है—जी हां, हमारा अपना ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’। इस विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां बिना किसी रिसर्च, बिना किसी लैब और बिना किसी डिग्री के रोज सुबह-सुबह लाखों नए ‘वैज्ञानिक’ और ‘इतिहासकार’ पैदा होते हैं।
यूनेस्को का ‘बेस्ट’ और नासा का ‘कन्फर्मेशन’
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के दावों के अनुसार, यूनेस्को (UNESCO) के पास दुनिया में और कोई काम नहीं है। उनका एकमात्र काम भारत की हर चीज को ‘सर्वश्रेष्ठ’ घोषित करना है। कभी हमारे राष्ट्रगान को ‘बेस्ट नेशनल एंथम’ का अवार्ड मिल जाता है, तो कभी हमारे सिक्कों को ‘बेस्ट करेंसी’ का। यूनेस्को वाले खुद पेरिस में बैठकर हैरान हैं कि उन्होंने ये अवार्ड कब और किसे दे दिए! लेकिन हमारे ‘व्हाट्सएप फूफाजी’ को इस बात की पूरी चिंता रहती है कि अगर यह संदेश सुबह ९ बजे से पहले ११ लोगों को नहीं भेजा गया, तो यूनेस्को अपना फैसला बदल लेगा।
नासा के वैज्ञानिक और रसोई के मसाले
यूनेस्को से फुर्सत मिले तो नासा (NASA) के वैज्ञानिक भी कम नहीं हैं। व्हाट्सएप के ‘रिसर्च पेपर्स’ बताते हैं कि नासा वाले अंतरिक्ष छोड़कर रात-दिन सिर्फ इस बात पर रिसर्च कर रहे हैं कि गोबर में कौन सी एंटी-रेडिएशन चिप लगी है या हल्दी-नमक के मिश्रण से एलियंस को कैसे भगाया जा सकता है। नासा के वैज्ञानिक अंतरिक्ष की सैर छोड़, हमारे रसोई घर के मसालों पर पीएचडी कर रहे हैं। कमाल की बात यह है कि इन दावों को पढ़ने वाले इसे परम सत्य मानकर तुरंत ‘फॉरवर्ड’ बटन दबा देते हैं।
अंतिम सत्य: ११ लोगों को फॉरवर्ड करें
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की हर खोज का अंत एक ही चेतावनी पर होता है—‘इसे तुरंत आगे बढ़ाएं, शाम तक बड़ी खुशखबरी मिलेगी।’ अगर आपने इसे अनदेखा किया, तो आपकी किस्मत पर ताला लग सकता है। डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत भले ही गलत साबित हो जाए, लेकिन व्हाट्सएप के फॉरवर्डेड मैसेज का यह ‘ग्यारह लोगों वाला नियम’ कभी फेल नहीं होता।
तो प्रिय पाठकों, अगली बार जब आपके पास ‘चांद पर उगने वाले जादुई टमाटर’ या ‘गरम पानी पीने से सभी बीमारियों का अंत’ वाला मैसेज आए, तो अपने अंगूठे को थोड़ा आराम दें। ज्ञान बांटना पुण्य का काम है, लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का ‘कबाड़’ बांटने से बचें। वरना, ‘काक-वाणी’ तो आपके इस ज्ञान की पोल खोलती ही रहेगी!