अरे वाह! अमेरिकी राजनीति के महान आकाओं को अचानक नींद से उठकर एक नया और अत्यंत ‘भयानक’ खतरा दिखाई देने लगा है—’हिंदू डॉलर’! जी हां, वही डॉलर जो अब तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था को चमकाने, सिलिकॉन वैली के सॉफ्टवेयर को चलाने और उनके भारी-भरकम टैक्स भरने के काम आ रहा था, अब अचानक जांच के दायरे में आ गया है। ‘काक-वाणी’ की इस विशेष रिपोर्ट में आपका स्वागत है, जहां हम अमेरिकी लोकतंत्र की इस नई और अनोखी नौटंकी का निष्पक्ष और कड़वा विश्लेषण करेंगे।
मंदिरों पर हमला ‘सामान्य’, पर डॉलर पर सवाल ‘जरूरी’?
अमेरिका में चुनाव का मौसम करीब आ रहा हो और वहां के नेताओं को भारत या हिंदुओं की याद न आए, ऐसा भला कैसे हो सकता है? सुहाग शुक्ला जैसी हिंदू-अमेरिकी हस्तियां चिल्ला-चिल्लाकर थक गईं कि भाई, वहां हिंदू मंदिरों पर हमले हो रहे हैं, घृणा फैलाई जा रही है और भारत-विरोधी राजनीति का नया बाज़ार सजाया जा रहा है। लेकिन अमेरिकी राजनेताओं की आँखों पर तो वोटों का ऐसा चश्मा चढ़ा है कि उन्हें मंदिरों की टूटती दीवारें तो दिखाई नहीं देतीं, पर भारतीय-अमेरिकियों का बढ़ता राजनीतिक प्रभाव ज़रूर चुभने लगता है।
जब तक H1-B वीजाधारी भारतीय इंजीनियर दिन-रात गुलामों की तरह खटकर अमेरिकी कंपनियों का मुनाफा बढ़ाते हैं, तब तक वे ‘सज्जन और आदर्श अप्रवासी’ होते हैं। लेकिन जैसे ही वे अपनी गाढ़ी कमाई से अपने अधिकारों, संस्कृति या भारत के हितों की बात करने लगते हैं, उनका पैसा तुरंत ‘संदिग्ध’ और ‘लोकतंत्र के लिए खतरा’ बन जाता है। कितना अद्भुत और सुविधाजनक है यह पश्चिमी चश्मा!
H1-B वीजा और दोहरे मापदंड का चुनावी तमाशा
अमेरिकी राजनीति का यह पैंतरा सचमुच काबिल-ए-तारीफ है। चुनाव आते ही H1-B वीजा धारकों को बलि का बकरा बना दिया जाता है। एक तरफ आप अपने चुनाव प्रचार के लिए भारतीय प्रवासियों से चंदा भी लेंगे, और दूसरी तरफ ‘एंटी-इंडिया’ राजनीति को हवा देकर अपने स्थानीय वोट बैंक को भी खुश रखेंगे।
‘काक-वाणी’ का स्पष्ट मानना है कि यह सब सिर्फ अमेरिकी नेताओं की अपनी नाकामियों को छिपाने की कला है। जब अपने देश की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था और महंगाई का जवाब न सूझे, तो किसी समृद्ध और शांतिप्रिय समुदाय को निशाना बना दो। अमेरिकी हुकमरानों को दूसरों की मेहनत का ‘डॉलर’ तो बहुत प्यारा लगता है, लेकिन जब वही समुदाय अपने सम्मान की बात करे, तो उन्हें पेट में दर्द होने लगता है। तो जनाब, अगली बार जब कोई अमेरिकी नेता मानवाधिकार का प्रवचन दे, तो समझ जाइएगा कि पीछे कहीं किसी चुनावी फंड की गिनती चल रही है!
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