अल जज़ीरा की रात की नींद उड़ी: ‘नमस्ते ट्रंप’ से ‘कौन ट्रंप?’ तक भारत का दर्दनाक सफर!

अरे भइया, अंतरराष्ट्रीय राजनीति का रोना भी बड़ा अनोखा है! अल जज़ीरा ने एक बेहद क्रांतिकारी और आंखें खोल देने वाली रिपोर्ट छापी है। शीर्षक है – “अमरीकी मध्यावधि चुनावों से पहले भारत का दिल ट्रंप से क्यों खट्टा हो गया?” अब आप ही बताइए, जब तक दोहा के एसी कमरों में बैठे पत्रकारों को भारत के नुक्कड़-चौराहों की चिंता न हो, तब तक दुनिया का लोकतंत्र कैसे चलेगा?

चाय की टपरी और ‘ट्रंप चाचा’ का अचानक मिटा प्रेम

काक-वाणी के गुप्त सूत्रों (यानी हमारी गली की चाय की टपरी) की मानें तो आजकल हमारे देश के ज्ञानी अंकल लोग ट्रंप के बजाय अपने घरेलू बजट, पेट्रोल के दाम और टी-20 मैच पर ज्यादा बहस कर रहे हैं। अल जज़ीरा को शायद इस बात से गहरा सदमा पहुंचा है कि भारतीय नागरिक सुबह उठकर ट्रंप के बयानों का जाप क्यों नहीं कर रहे!

एक जमाना था जब ‘हाउडी मोदी’ और ‘नमस्ते ट्रंप’ के ढोल इस तरह पीटे गए थे मानो ट्रंप चाचा भारत के किसी राज्य के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हों। लेकिन फिर क्या हुआ? ट्रंप साहब ने जैसे ही भारतीय सामानों पर टैरिफ की मार मारी और वीजा वालों को आंखें दिखाईं, भारतीय जनता ने भी वही किया जो वह हमेशा करती है—”काम निकल गया, तो कौन हो तुम?”

अल जज़ीरा की ‘महान’ रिसर्च

अल जज़ीरा को लगता है कि अमरीकी मिडटर्म चुनाव से पहले भारतीयों का ट्रंप से मोहभंग होना वाशिंगटन के लिए बहुत बड़ी तबाही है। जैसे टेक्सस का अमरीकी वोटर इस बात पर वोट देगा कि दिल्ली के करोल बाग में रहने वाले शर्मा जी ट्रंप के बारे में क्या सोचते हैं! वाह, क्या ज्ञान है!

सच तो यह है कि भारत का आम नागरिक बहुत व्यावहारिक है—जो हमारे फायदे की बात करे, वो हमारा सगा। ट्रंप साहब का क्या है, वे तो अपनी ही बात से पलटने में ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट हैं। सुबह भारत को ‘महान दोस्त’ बताएंगे और शाम को ‘प्रदूषण फैलाने वाला देश’। ऐसे में हमारे विश्लेषक भी कंफ्यूज हो गए कि उनके किस रूप की पूजा करें?

निष्कर्ष: काक-वाणी की मुफ्त सलाह

अल जज़ीरा के सम्मानित पत्रकारों को हमारा सीधा सुझाव है: अमरीका के चुनाव अमरीकियों के भरोसे छोड़ दीजिए। भारत का दिल ट्रंप से खट्टा हुआ है या मीठा, यह जानने के लिए आपको मोटेरा स्टेडियम की पुरानी तस्वीरों से बाहर निकलकर आज के ज़मीनी मिज़ाज को समझना होगा। तब तक के लिए, ट्रंप चाचा को हमारी तरफ से बधाई, लेकिन चाय का बिल वे खुद ही भरें!


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कागा जी