‘आदर्श नारी’ का जमाना गया! फ्रीडा पिंटो बोलीं- अब भारतीय सिनेमा में दिख रही हैं ‘असली’ और ‘इम्पर्फेक्ट’ महिलाएं

बॉलीवुड की गलियों में बदलाव की हवा बह रही है और इसकी महक सात समुंदर पार बैठी फ्रीडा पिंटो तक भी पहुंच गई है! ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ फेम फ्रीडा पिंटो ने हाल ही में भारतीय सिनेमा की जमकर तारीफ की है। फ्रीडा का कहना है कि अब हमारा सिनेमा महिलाओं को सिर्फ ‘पवित्र देवी’ या ‘आदर्श संस्कारी नारी’ के सांचे में ढालकर पेश नहीं कर रहा, बल्कि उन्हें ‘इम्पर्फेक्ट’ यानी कमियों से भरा और एक असली इंसान के रूप में दिखा रहा है।

‘सती-सावित्री’ वाले ढर्रे से बाहर निकला सिनेमा!

एक दौर था जब हिंदी फिल्मों में हीरोइन का मतलब सिर्फ त्याग की मूरत, हर वक्त मुस्कुराने वाली और हर जुल्म सहने वाली महिला माना जाता था। अगर किसी महिला किरदार में थोड़ी सी भी कमी या गुस्सा दिख जाता, तो उसे तुरंत ‘ग्रे’ या विलेन की कैटेगरी में डाल दिया जाता था। लेकिन फ्रीडा पिंटो कहती हैं कि अब जमाना बदल चुका है। आज की फिल्मों और ओटीटी सीरीज में महिलाएं गलतियां भी करती हैं, अपने हक के लिए लड़ती हैं और कभी-कभी जिद्दी भी होती हैं – ठीक वैसे ही जैसे असल जिंदगी में हर इंसान होता है।

फ्रीडा को भाया देसी सिनेमा का नया अवतार

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक्टिंग का जादू चला चुकीं फ्रीडा पिंटो ने इस बदलाव को भारतीय सिनेमा का एक बेहद खूबसूरत और परिपक्व दौर बताया। उनका मानना है कि पर्दे पर ‘परफेक्ट’ दिखने की इस मजबूरी को खत्म करना बेहद जरूरी था। आज के दर्शक भी ऐसी कहानियों को सिर-आंखों पर बैठा रहे हैं, जहां अभिनेत्रियां सिर्फ शो-पीस बनकर नहीं रहतीं, बल्कि उनके किरदारों में गहराई और वास्तविकता नजर आती है।

‘काक-वाणी’ का टेक: अब सिनेमा हुआ थोड़ा और सच्चा!

बात तो फ्रीडा पिंटो ने बिल्कुल पते की कही है! ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’, ‘डार्लिंग्स’ या फिर ‘थप्पड़’ जैसी फिल्मों ने यह साबित कर दिया है कि जब महिला किरदारों को उनके असली और उलझे हुए रंगों के साथ दिखाया जाता है, तो कहानी सीधे दर्शकों के दिल में उतरती है। अब देखना यह होगा कि ‘इम्पर्फेक्ट’ किरदारों का यह सफर आने वाले दिनों में और कितने नए आयाम गढ़ता है। ‘काक-वाणी’ की तरफ से इस बदलते सिनेमा को एक बड़ा थम्स-अप!


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कागा जी