ईवीएम की विदाई और मतपत्र की ‘घर वापसी’: इंडिया गठबंधन का नया ‘मास्टरस्ट्रोक’

एक बार फिर हमारे विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ के दूरदर्शी और दिव्य-दृष्टि प्राप्त नेताओं ने दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठकर देश के लोकतंत्र को आईसीयू से बाहर निकालने का ऐतिहासिक संकल्प लिया है। चाय के कपों और समोसों के दौर के बीच, इस बार का एजेंडा बेहद गंभीर था। चर्चा इस बात पर नहीं थी कि जनता का दिल कैसे जीता जाए, बल्कि इस बात पर थी कि अपनी हार के लिए नए बहानों की स्क्रिप्ट कैसे तैयार की जाए। ‘काक-वाणी’ के सूत्रों के अनुसार, बैठक में लोकतंत्र बचाने के नाम पर कुछ ऐसे प्रस्ताव पारित हुए हैं जिन्हें सुनकर खुद विधाता भी सिर पकड़ लें।

ज्ञानेश कुमार: विलेन नंबर वन का नया खिताब

गठबंधन के महायोद्धाओं ने एक सुर में मांग की है कि चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तुरंत उनके पद से हटाया जाए। आखिर क्यों न हटाया जाए? लोकतांत्रिक नियमों के अनुसार, निष्पक्ष चुनाव वही होता है जिसमें विपक्ष भारी बहुमत से जीत जाए। अगर नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आते, तो जाहिर है कि चुनाव आयुक्त की नीयत में खोट है। अब तक बेचारे ज्ञानेश कुमार सोच रहे होंगे कि उन्होंने अपनी ड्यूटी ईमानदारी से निभाई, लेकिन उन्हें क्या पता कि विपक्ष की कसौटी पर खरा उतरने के लिए पहले उन्हें चुनावी नतीजों की होम डिलीवरी करनी होगी।

ईवीएम से नफरत, मतपत्र से बेइंतहा मोहब्बत

बैठक का सबसे क्रांतिकारी और प्रगतिशील हिस्सा था मतपत्र (बैलेट पेपर) की ‘घर वापसी’ का संकल्प। जब पूरी दुनिया डिजिटल क्रांति और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ओर भाग रही है, तब हमारे प्यारे नेता हमें 90 के दशक के उस सुनहरे दौर में ले जाना चाहते हैं जहां मतपेटियों को तालाब में फेंकना, पोलिंग बूथों पर सरेआम गुंडागर्दी करना और हफ्तों तक वोटों की गिनती का इंतजार करना एक रोमांचक राष्ट्रीय खेल हुआ करता था। वैसे भी, हार का ठीकरा फोड़ने के लिए एक निर्जीव और बेजुबान मशीन (ईवीएम) से बेहतर भला क्या हो सकता है? मतपत्र आएगा, तो कम से कम स्याही फेंकने का पुराना हुनर तो जिंदा रहेगा!

चुनाव आयोग के खिलाफ रैलियों का महासंग्राम

अब विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ देशव्यापी रैलियां करके जनता को यह समझाएगा कि महंगाई, बेरोजगारी और सड़कें तो बस मोह-माया हैं; असली समस्या यह है कि चुनाव आयोग उन्हें जीतने क्यों नहीं दे रहा। इन रैलियों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि मंच पर खड़े नेता एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने का नाटक कितनी देर तक कर पाते हैं, क्योंकि मंच से नीचे उतरते ही उनकी असली लड़ाई शुरू हो जानी है।

काक-वाणी का मानना है कि इस बार गठबंधन ने अपनी रणनीति बिल्कुल सही चुनी है। जब खुद की गलतियों को सुधारना मुश्किल हो, तो पूरे सिस्टम को ही विलेन घोषित कर देना सबसे सुरक्षित राजनीतिक निवेश है। ऑल द बेस्ट, इंडिया गठबंधन! मतपत्र वापस आए न आए, आपका यह मनोरंजक नाटक हमेशा चलता रहना चाहिए।


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी