चाय की केतली और ‘महान रणनीति’: जब लुटियन्स के विचारकों ने मापा भाजपा का ‘सीलिंग फैन’

वाह! धन्य हैं हमारे देश के वे बौद्धिक शूरवीर, जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर, ‘कैमोमाइल टी’ की चुस्कियां लेते हुए देश की विदेश नीति का एक्स-रे कर देते हैं। हाल ही में ‘द वायर’ महाशय को अचानक रात में यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ कि BJP सरकार ने भारत की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं पर एक ‘सीलिंग’ (छत) लगा दी है। विशेषकर ब्रिक्स (BRICS) के मंच पर, जहां भारत को विश्वगुरु बनना था, वहां सरकार की नीतियों ने हमारी उड़ान को कतर दिया है। अब इस महान खुलासे के बाद, विदेश मंत्रालय को अपनी चाबी तुरंत इन लैपटॉप-धारी बुद्धिजीवियों को सौंप देनी चाहिए।

लुटियन्स की ‘महान रणनीति’ और जमीनी हकीकत

इन विश्लेषकों का सबसे बड़ा दर्द यह है कि भारत के पास कोई ‘ग्रैंड स्ट्रैटेजी’ यानी महान रणनीति नहीं है। अब इन्हें कौन समझाए कि असली ‘ग्रैंड स्ट्रैटेजी’ तो वही थी, जब अतीत में बिना किसी तैयारी के ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे लगाकर देश को युद्ध में झोंक दिया गया था! आज जब BJP के नेतृत्व में भारत, चीन की आंखों में आंखें डालकर सीमा पर डटा हुआ है, रूस से पश्चिमी प्रतिबंधों की परवाह किए बिना तेल खरीद रहा है और अमेरिका को भी अपनी शर्तों पर झुकने को मजबूर कर रहा है, तो हमारे लुटियन्स के विचारकों को इसमें ‘महत्वाकांक्षा की कमी’ नजर आती है। शायद उनके लिए असली रणनीति तब होती जब भारत ब्रिक्स समिट में चीन के प्रस्तावों पर बिना सोचे-समझे दस्तखत कर देता।

जब ‘सीलिंग’ ही बन जाए आसमान

इस तथाकथित ‘सीलिंग’ का रोना रोने वाले यह भूल जाते हैं कि इसी तथाकथित ‘सीमित दायरे’ में रहकर भारत आज ग्लोबल साउथ (Global South) का अघोषित नेता बन चुका है। लेकिन नहीं, जब तक किसी विदेशी विश्वविद्यालय का प्रोफेसर भारत की पीठ न थपथपाए, तब तक इन देशी विचारकों का हाजमा ठीक नहीं होता। इनके अनुसार, भारत को ब्रिक्स में कुछ ऐसा ‘तूफानी’ करना चाहिए था जिससे शी जिनपिंग और पुतिन हैरान रह जाते। अब कूटनीति कोई रिएलिटी शो तो है नहीं कि वहां जाकर ड्रामा किया जाए।

‘काक-वाणी’ का तो साफ मानना है कि जब तक देश के भीतर बैठे कुछ लोगों को विदेशी चश्मे से अपनी कमियां देखने की बीमारी रहेगी, तब तक उन्हें भारत की हर बड़ी छलांग में ‘गिरावट’ ही दिखेगी। भाजपा की इस ‘सीलिंग’ के नीचे रहकर भी अगर भारत आज दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और ब्रिक्स में अपनी शर्तों पर खेल रहा है, तो भगवान करे यह ‘सीलिंग’ थोड़ी और नीची हो जाए, ताकि हमारे हवा में उड़ने वाले बुद्धिजीवी जमीन पर आ सकें!


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी