चुनाव आयुक्त का ‘इस्तीफा’ और कॉकरोच पार्टी का ‘क्रांतिकारी’ विलाप

लोकतंत्र का सबसे नया विलेन: मुख्य चुनाव आयुक्त

भारत में जब भी कोई चुनाव समाप्त होता है, तो दो चीजें निश्चित रूप से होती हैं—एक, विजेताओं का विजय जुलूस और दूसरा, हारने वालों का चुनाव आयोग के दफ्तर के बाहर हाई-डेसिबल विलाप। इस बार भी कुछ अलग नहीं हुआ। जर्मनी के महान मीडिया घराने ‘डीडब्ल्यू’ (DW) ने दुनिया को एक बड़ी खबर दी है कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हिंसक रूप से तेज हो गए हैं। और इस महान क्रांतिकारी आंदोलन के अगुआ कौन हैं? हमारे परम आदरणीय गांधी जी और उनकी चहेती ‘कॉकरोच पार्टी’! विदेशी मीडिया भी भारत के इस ‘लोकतांत्रिक तमाशे’ को चटखारे लेकर देख रहा है और हमें अपनी किस्मत पर रोना आ रहा है।

कॉकरोच पार्टी: जो परमाणु हमले में भी बची रहे, पर चुनाव हार जाए

अब आप सोच रहे होंगे कि यह ‘कॉकरोच पार्टी’ क्या बला है? दरअसल, यह राजनीति की वह प्रजाति है जो चाहे कितनी भी राजनीतिक सुनामी आए, कितनी भी करारी हार हो, कभी खत्म नहीं होती। वैज्ञानिकों का मानना है कि परमाणु हमले में भी कॉकरोच बच जाते हैं, ठीक वैसे ही यह पार्टी भी हर चुनाव में साफ होने के बाद फिर से ‘ईवीएम हैक’ का नारा लगाने के लिए जीवित हो उठती है। गांधी जी और उनकी इस अनोखी सेना का सीधा आरोप है कि चुनाव में ‘धांधली’ हुई है। इस पार्टी के महान रणनीतिकारों का मानना है कि जनता तो उन्हें पलकों पर बिठाने के लिए तैयार खड़ी थी, लेकिन चुनाव आयोग के कंप्यूटरों ने सारा खेल बिगाड़ दिया।

ईवीएम की ‘चोरी’ और जनता की ‘मासूमियत’

वाह! क्या गजब का तर्क है। जब ये किसी राज्य में गलती से जीत जाते हैं, तो देश में लोकतंत्र मुस्कुराने लगता है, ईवीएम एकदम गंगा जल जैसी पवित्र हो जाती है। लेकिन जैसे ही जनता इन्हें जोर का झटका धीरे से देती है, अचानक मुख्य चुनाव आयुक्त किसी हॉलीवुड फिल्म के सुपर-विलेन की तरह दिखाई देने लगते हैं। आंदोलनकारी सड़कों पर छाती पीट रहे हैं कि चुनाव आयुक्त ने लोकतंत्र की हत्या कर दी है। अरे भाई, अगर जनता ने तुम्हें वोट देने के बजाय घर पर सोना बेहतर समझा, तो बेचारा चुनाव आयुक्त अपने घर से वोट लाकर तो तुम्हारे डिब्बे में नहीं डालेगा ना?

खैर, ‘काक-वाणी’ का तो यही मानना है कि जब तक देश में चुनाव होते रहेंगे, तब तक हमारे ये पराजित सूरमा और उनकी ‘कॉकरोच सेना’ सड़कों पर टेंट लगाकर जनता का मुफ्त मनोरंजन करती रहेगी। आखिरकार, अपनी नाकामी छुपाने के लिए चुनाव आयोग को गाली देने से सस्ती और बेहतरीन थेरेपी दुनिया में और कोई नहीं है!


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कागा जी