अरे ओ काका! राजनीति के अखाड़े में कड़ाही चढ़ी थी, तेल भी गरम था, और हमारे टेक्सास वाले रिपब्लिकन साहब सोचे थे कि भारतीय-अमेरिकियों को तलकर अपनी चुनावी चुनावी वैतरणी पार कर लेंगे। लेकिन किस्मत का चक्का ऐसा घूमा कि भारत-विरोध का तड़का लगाने चले नेता जी खुद ही ‘फ़्रेंच फ़्राइज’ बनकर बाहर निकले हैं! ‘काक-वाणी’ की इस विशेष कड़वी घूंट में आपका स्वागत है।
‘हाउडी टेक्सास’ से ‘बाय-बाय साहिब’ तक का सफर
टेक्सास के इन महान दूरदर्शी नेता जी ने सोचा होगा कि चुनाव जीतने की सबसे आसान रेसिपी क्या है? बस, भारतीय प्रवासियों को कोसना शुरू कर दो! साहिब का मानना था कि भारतीय तो सीधे-साधे आईटी इंजीनियर हैं, जो सिर्फ कंप्यूटर की स्क्रीन घूरते हैं और रात को बटर चिकन खाकर सो जाते हैं। उन्हें क्या पता था कि यही देसी जब वोटिंग मशीन का बटन दबाने उतरेंगे, तो किसी का भी राजनीतिक गणित बिगाड़ देंगे।
नेता जी भूल गए थे कि टेक्सास में सिर्फ तेल के कुएं नहीं, बल्कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय का तगड़ा वोट बैंक और ‘डॉलर पावर’ भी चलती है। साहब ने नफरत की जो दुकान खोली थी, भारतीय समुदाय ने उसका सारा सामान समेटकर उन्हें हमेशा के लिए बेरोजगार कर दिया।
करी का तड़का और रिपब्लिकन कड़ाहा
राजनीति की ताजी खबर यह है कि अब रिपब्लिकन पार्टी के बड़े-बड़े रणनीतिकार सिर पकड़कर बैठे हैं। वे सोच रहे हैं कि आखिर ‘फ़्रेंच’ साहब से कहां चूक हुई? अरे साहिब, चूक वहां हुई जहां आपने यह समझ लिया था कि भारत-विरोध का कार्ड खेलकर आप स्थानीय लोगों के मसीहा बन जाएंगे। नतीजा यह हुआ कि जनता ने ऐसा केचप लगाया कि नेता जी का राजनीतिक करियर ही प्लेट से गायब हो गया!
इसे कहते हैं असली ‘कर्मों का फल’। चले थे भारतीय प्रवासियों को ‘बाहरी’ बताकर किनारे करने, और आज खुद ही अपनी पार्टी की प्राथमिकताओं के हाशिए पर चले गए हैं। अब बेचारे घर बैठकर यही सोच रहे होंगे कि समोसे के साथ मिलने वाली चटनी में इतनी कड़वाहट थी या उनके अपने बयानों में?
काक-वाणी की मुफ्त सलाह
काक-वाणी की अमेरिका के सभी महत्वाकांक्षी नेताओं को सीधी और स्पष्ट सलाह है—यदि टेक्सास या अमेरिका के किसी भी कोने में राजनीति की दुकान चलानी है, तो भारतीय समुदाय की क्षमता को हलके में मत लीजिए। आप उनके बनाए सॉफ्टवेयर पर दुनिया चला रहे हैं, तो जरा संभलकर रहिए! अगर उनके अस्तित्व पर उंगली उठाएंगे, तो जनता ऐसा फ़्रेंच फ़्राइज बनाएगी कि आप ना घर के रहेंगे ना घाट के।
उम्मीद है, हमारे भूतपूर्व नेता जी अब अपने फुर्सत के दिनों में थोड़ा ‘चिकन टिक्का’ बनाना सीखेंगे और यह समझेंगे कि राजनीति में नफ़रत घोलने से बेहतर है रसोई में मसाले पीसना!
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