ड्रैगन का ‘कुकड़ूं-कूं’ और हमारी ‘लाल आंखें’: भारत में चीन अध्ययन की दिव्य लीला

वाह! तो अब हमारे देश के नीति-नियंता और बुद्धिजीवी इस बात पर माथापच्ची कर रहे हैं कि भारत में “चीन अध्ययन” (China Studies) की क्या स्थिति है। ओआरएफ (ORF) की ताजा रिपोर्ट कहती है कि हमें भू-राजनीति, अर्थशास्त्र और अकादमिक प्राथमिकताओं के त्रिकोण में चीन को समझना होगा। हमारे देश के परम ज्ञानियों को लगता था कि भारत में चीन को समझने का कोर्स बेहद सरल है—सुबह उठकर चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाइए, दोपहर को चाउमीन का बहिष्कार कीजिए और शाम को टीवी चैनलों पर ‘लाल आंख’ दिखाकर ड्रैगन को भस्म कर दीजिए। बस, चीन विशेषज्ञ की डिग्री तैयार!

अकादमिक प्राथमिकताओं का ‘मंचूरियन’ तड़का

हमारे यहाँ अकादमिक प्राथमिकताएं इतनी स्पष्ट हैं कि जब तक सीमा पर तनाव नहीं होता, तब तक चीन हमारे लिए केवल ‘सस्ते माल का थोक बाजार’ है। जैसे ही सीमा पर गरमा-गरमी बढ़ती है, हमारे विशेषज्ञ रातभर में ‘मंदारिन’ भाषा के पंडित बन जाते हैं। केंद्र सरकार और विदेश मंत्रालय के गलियारों में बैठे चतुर सुजान मानते हैं कि चीन को जानने के लिए किसी भारी-भरकम यूनिवर्सिटी जाने की क्या जरूरत है? जब हमारे माननीय मंत्री अपने तीखे बयानों से ही ड्रैगन को पानी पिला देते हैं, तो फिर विश्वविद्यालयों में चीनी इतिहास और भूगोल पर बजट क्यों बर्बाद करना? आखिर ‘कड़े शब्दों की निंदा’ ही हमारी सबसे बड़ी सामरिक ताकत है!

आर्थिक कूटनीति: बातें शेर की, व्यापार मेमने का

गंभीर बात तो यह है कि एक तरफ हम चीन को आंखें दिखाने का स्वांग रचते हैं, और दूसरी तरफ हमारा द्विपक्षीय व्यापार घाटा (Trade Deficit) रिकॉर्ड तोड़ रहा होता है। यह एक ऐसी अनोखी अर्थनीति है, जिसमें हम चीन से कच्चा माल खरीदकर उसी के पैसे से ‘आत्मनिर्भरता’ की बांसुरी बजाते हैं। इसे ही कहते हैं ‘साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’। चीन अध्ययन का असली कोर्स तो हमारे उन व्यापारियों को करना चाहिए, जो दिवाली की लाइटों से लेकर गणेश जी की मूर्तियों तक में चीनी ‘फिनिशिंग’ ढूंढ निकालते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था चीन के बिना वैसे ही अधूरी है जैसे बिना लहसुन-प्याज के मंचूरियन!

भू-राजनीति की ‘काक-दृष्टि’

अंततः, इस देश में चीन पर शोध का मतलब केवल इतना रह गया है कि हम यह साबित कर सकें कि सत्तर साल पहले किसने क्या गलती की थी। वर्तमान रणनीतिकारों की इस ‘भूतकाल-प्रेम’ नीति ने अकादमिक शोध को एक नया आयाम दिया है। जब तक हमारे पास ‘इतिहास की गलतियों’ का अचूक बहाना है, तब तक हमें किसी नए चीन अध्ययन केंद्र की क्या आवश्यकता है? ‘काक-वाणी’ का तो यही मानना है कि जब तक देश में मोमोस और स्प्रिंग रोल बिक रहे हैं, तब तक हमारा चीन से सांस्कृतिक जुड़ाव मजबूत है। बाकी कूटनीति तो टीवी स्टूडियो के एंकर संभाल ही रहे हैं!


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कागा जी