अरे भइया, जल्दी से अपनी-अपनी खिड़कियां बंद कर लीजिए! अपने चाय के कप को कसकर थाम लीजिए! अमरीका की परम ज्ञानी और ‘सर्वव्यापी’ पत्रिका ‘द अटलांटिक’ ने दुनिया को चेतावनी जारी कर दी है कि “भारत उबल रहा है” (Why India Is Erupting)। अब आप सोच रहे होंगे कि आप तो सुबह-सुबह शांति से नुक्कड़ पर बैठकर समोसा खा रहे थे, तो यह ‘ज्वालामुखी’ अचानक कब फट गया? अरे साहब, यही तो आपकी घनघोर अज्ञानता है! आपको क्या पता कि आपके अपने देश में क्या चल रहा है? असली जमीनी हकीकत तो वाशिंगटन डीसी के पांच सितारा एसी दफ्तर में बैठकर कॉफी पी रहे किसी गोरे पत्रकार को ही पता होती है!
वाशिंगटन की दूरबीन और भारत का ‘गंभीर संकट’
काक-वाणी के पाठकों को समझना होगा कि पश्चिमी मीडिया का यह पुराना और पवित्र धर्म-कर्तव्य है। जब भी वाशिंगटन या न्यूयॉर्क में मौसम थोड़ा बोरिंग हो जाता है, तो वहां के विद्वान पत्रकार अपनी विशेष ‘संकीर्ण दूरबीन’ निकालते हैं। इस दूरबीन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें भारत हमेशा ‘तबाही के मुहाने’ पर खड़ा ही दिखाई देता है। नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से भारत कम से कम दस हजार बार ‘पूर्ण विनाश’ के करीब पहुंच चुका है और रोजाना ‘लोकतंत्र की आखिरी सांस’ ले रहा है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि हम भारतीय इतने ढीठ हैं कि तबाह होने के बजाय चुपचाप यूपीआई से बीस रुपये का पेमेंट करते हैं और अपनी-अपनी नौकरी पर चले जाते हैं!
‘डेमोक्रेसी इन डेंजर’ का नया ओटीटी सीजन
‘द अटलांटिक’ के इस महा-विश्लेषण का लब्बोलुआब यही है कि भारत में सब कुछ जलकर खाक हो रहा है। अब भले ही देश में चुनाव शांतिपूर्वक निपट जाएं, विपक्षी दल अपनी सरकारें बना लें और जनता वीकेंड पर फिल्में देख रही हो, लेकिन अमरीकी पत्रकारों की मानें तो यह सब महज़ एक छलावा है! जब तक भारत की बागडोर उनके द्वारा तय किए गए किसी ‘सुसंस्कृत और उदारवादी’ नेता के हाथ में न आ जाए, तब तक भारत उनके पन्नों पर ऐसे ही ‘उबलता’ और ‘सुलगता’ रहेगा। हमारे देश का एक विशेष बुद्धिजीवी वर्ग भी इस लेख को सोशल मीडिया पर ऐसे शेयर कर रहा है मानो उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल गया हो। आखिर विदेशी आकाओं से भारत की बर्बादी का ‘सर्टिफिकेट’ जो मिल गया है!
काक-वाणी की अंतिम सलाह
सच तो यह है कि ‘द अटलांटिक’ जैसी पत्रिकाओं की असली तकलीफ यह नहीं है कि भारत उबल रहा है, बल्कि तकलीफ यह है कि भारत अब उनके बताए ढर्रे पर चलने से इनकार कर रहा है। काक-वाणी की सीधी और मुफ्त सलाह है कि वाशिंगटन के इन पत्रकारों को थोड़ा ठंडा पानी पीना चाहिए। भारत में ‘उबाल’ सिर्फ सुबह-सुबह भगोने में उबलती हुई कड़क अदरक वाली चाय में आता है। इसलिए इस लेख को पढ़िए, जोर से हंसिए, और अपनी चाय की चुस्की का आनंद लीजिए!
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