अहा! अमरीका के सात समुद्र पार से एक और महान ज्ञान की गंगा बही है। इस बार प्रतिष्ठित पत्रिका ‘द न्यू यॉर्कर’ को अचानक आधी रात को चिंता का दौरा पड़ा और उन्होंने शीर्षक चिपकाया—’क्या यह भारतीय लोकतंत्र के अंत की शुरुआत है?’ मैनहट्टन के किसी आलीशान कैफे में बैठकर, दस डॉलर की सोया-मिल्क लट्टे की चुस्कियां लेते हुए गोरे पत्रकारों को अचानक महसूस हुआ कि 1.4 अरब की आबादी वाला भारत अपने लोकतंत्र की अंतिम सांसें गिन रहा है। ‘काक-वाणी’ इस महान अंतरराष्ट्रीय हमदर्दी पर अपना सर झुकाती है!
मैंगो लट्टे और गोरे साहबों की ‘उद्धारक’ सोच
पश्चिमी मीडिया का अपना एक अलग ही ‘विदेशी मसीहा कॉम्प्लेक्स’ है। उनके तय मानकों के हिसाब से, जब तक भारत का आम चुनाव उनकी पसंद के परिणाम न दे, तब तक लोकतंत्र वेंटिलेटर पर ही रहता है। द न्यू यॉर्कर के संपादकों को लगता है कि भारतीय लोकतंत्र कोई कांच का मर्तबान है, जो न्यू यॉर्क के किसी सेमिनार में ज़रा सी ठेस लगते ही चटक जाएगा। उन्हें कौन समझाए कि हमारे यहाँ का लोकतंत्र इतना ढीठ और मजबूत है कि वह हर पांच साल में मुफ़्त की रेवड़ियों, दलबदलुओं, जातिगत गणित और टीवी डिबेट्स के 9 बजे वाले मुर्गों की लड़ाई को झेलकर भी शान से ज़िंदा रहता है।
लोकतंत्र मरा नहीं है, बस ‘स्टेरॉयड’ पर है!
अरे साहब! जिसे विदेशी मीडिया ‘लोकतंत्र का अंत’ कह रहा है, उसे भारत में ‘चुनावी त्यौहार’ कहते हैं। यहाँ लोकतंत्र मरा नहीं है, बल्कि ओवर-एक्टिव हो चुका है। नेता सुबह एक दल में प्रभु श्री राम के भजन गाते हैं, दोपहर को दूसरी पार्टी में सेक्युलरवाद का झंडा उठाते हैं और शाम को तीसरी पार्टी के टिकट पर पर्चा भर देते हैं। विधायक रिसॉर्ट्स में स्विमिंग सीख रहे हैं और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के स्नातक अपने-अपने मोहल्ले में तीसरा विश्व युद्ध लड़ रहे हैं। क्या कोई मरता हुआ लोकतंत्र इतना रंगीन, जीवंत और हंगामेदार हो सकता है?
फ्री की सलाह बंद करो, अपनी कॉफी संभालो!
अमरीकी और यूरोपीय बुद्धिजीवियों को दुनिया भर में ‘लोकतंत्र’ बांटने की पुरानी बीमारी है। उन्होंने इराक और लीबिया में भी ‘लोकतंत्र की रक्षा’ की थी, जिसका नतीजा आज पूरा भूगोल भुगत रहा है। इसलिए, हे मैनहट्टन के ज्ञानियों! भारत का लोकतंत्र कोई मैकडॉनल्ड्स का बर्गर नहीं है जो आपके मेनू कार्ड के हिसाब से पकेगा। यह भारतीय गोलगप्पे की तरह है—तीखा, चटपटा, थोड़ा अव्यवस्थित, लेकिन इसे पचाने का हुनर सिर्फ भारतीय वोटर के पास है। इसलिए आराम कीजिए, एक कप और कॉफी पीजिए। हमारा लोकतंत्र इतनी जल्दी नहीं मरने वाला, अभी तो अगले चुनाव के एग्जिट पोल आना बाकी हैं!
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