धैर्य का ‘अमृत काल’ और ये ‘अधीर’ महिलाएं!

वाह! ‘द गार्जियन’ के गोरे पत्रकारों को भी भारत की महिलाओं के “धैर्य” खोने की बड़ी चिंता सता रही है। रिपोर्ट कहती है कि भारत की महिलाएं बदलाव के लिए बेहद ‘अधीर’ (इम्पेशेंट) हो चुकी हैं। अब भला कोई इन विदेशी पत्रकारों को समझाए कि हमारे महान लोकतंत्र में ‘धैर्य’ ही तो सबसे बड़ा राष्ट्रीय आभूषण है। जब हमारे माननीय नेता पिछले कई दशकों से देश को ठीक करने के लिए ‘धैर्य’ का उपदेश दे रहे हैं, तो ये महिलाएं भला सड़कों पर आकर इस तपस्या को क्यों भंग कर रही हैं?

धैर्य की देवी को अचानक ये क्या हुआ?

हमारे नेताओं का मानना है कि भारतीय नारी सहनशीलता की साक्षात मूरत है। उसे न्याय के लिए सालों-साल कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े, तो क्या हुआ? कम से कम वह ‘अधीर’ तो नहीं होती थी! लेकिन आज की इन महिलाओं को देखिए, उन्हें सुरक्षा भी तुरंत चाहिए, न्याय भी फौरन चाहिए और बराबरी भी अभी के अभी चाहिए। भला ये भी कोई बात हुई? क्या इन्होंने हमारे देश का ‘सिस्टम’ नहीं देखा? यहाँ एक पुल बनने में दस साल लग जाते हैं, और इन्हें सुरक्षा की गारंटी रातों-रात चाहिए!

विदेशी साजिश और हमारी स्वदेशी चुप्पी

जैसे ही विदेशी मीडिया ने इन महिलाओं की ‘अधीरता’ पर लेख छापा, हमारे चतुर नेताओं ने तुरंत अपनी चुनावी दूरबीनें सीधी कर लीं। यह निश्चित रूप से भारत की छवि बिगाड़ने की कोई विदेशी साजिश है! हमारे यहाँ तो ‘बेटी बचाओ’ के बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे हैं, सेल्फी पॉइंट्स बने हैं, और हर चुनाव से ठीक पहले महिलाओं के खातों में सम्मान राशि भी तो डाल दी जाती है। अब इतने बड़े ‘उपकारों’ के बाद भी अगर महिलाएं सड़कों पर तख्तियां लेकर खड़ी हो जाएं, तो नेताओं का दिल तो टूटेगा ही ना!

सिस्टम का अमर मंत्र: “कृपया धैर्य बनाए रखें”

जब भी कोई महिला बदलाव या सुरक्षा की मांग करती है, हमारा सिस्टम उन्हें एक ही मधुर धुन सुनाता है- “आपकी कॉल हमारे लिए महत्वपूर्ण है, कृपया प्रतीक्षा करें।” पुलिस से लेकर नेताओं तक, सबके पास जांच समितियों का ऐसा अद्भुत चक्रव्यूह है कि न्याय खुद थककर सो जाता है। लेकिन इन ‘अधीर’ महिलाओं को कौन समझाए कि असली बदलाव तो केवल भाषणों और विज्ञापनों में ही अच्छा लगता है। असल जिंदगी में तो बस ‘अमृत काल’ का आनंद लीजिए और व्यवस्था पर पूरा भरोसा रखिए, क्योंकि सरकार अभी ‘सोच’ रही है!


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कागा जी