नेताओं के ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ पर एफआईआर: जब चुटकुला बन जाए राजद्रोह

संविधान में ‘हंसने के अधिकार’ पर आपातकाल

भारतीय राजनीति में आजकल एक नया संकट मंडरा रहा है—संवेदनशील त्वचा का संकट। हमारे भारतीय राजनेता इतने कोमल हृदय के हो गए हैं कि करोड़ों के घोटाले और भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े आरोपों को तो वे ठहाका मारकर पचा जाते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर बना एक अदना सा ‘मीम’ उन्हें सीधे आईसीयू या फिर पुलिस थाने पहुंचा देता है। हाल ही में ‘द प्रिंट’ की एक रिपोर्ट ने भी इस बात पर मुहर लगा दी है कि हमारे नेताओं को अब थोड़ा मजाक सहना सीखना होगा। लेकिन साहब, मजाक सहना तो दूर, हमारे नेता तो ‘हास्य-रस’ को भी राजद्रोह की श्रेणी में डालने पर आमादा हैं!

चुटकुला बनाने वालों के लिए विशेष जेलें

जरा सोचिए, कितना कठिन काम है नेता होना! दिन-रात देश सेवा के झूठे दावे करने पड़ते हैं, और ऊपर से कोई कार्टूनिस्ट उनकी नाक या तोंद पर कार्टून बना दे! यह तो सीधे-सीधे ‘लोकतंत्र की हत्या’ है। विपक्षी दल चिल्लाते हैं कि सत्तापक्ष का सेंस ऑफ ह्यूमर खत्म हो चुका है, लेकिन खुद विपक्ष की तारीफ में कोई चुटकुला सुना दीजिए, तो वे भी मानहानि का मुकदमा ठोकने में सेकंड भर की देरी नहीं करेंगे। भारतीय राजनेता की डिक्शनरी में ‘मजाक’ केवल तब तक ही मनोरंजन है, जब तक वह विरोधी दल पर किया जा रहा हो। जैसे ही मजाक का तीर अपनी तरफ आता है, कानून की धाराएं हरकत में आ जाती हैं।

हास्य-रस का नया सिलेबस: ‘हाहा’ नहीं, सिर्फ ‘वाह-वाह’

‘काक-वाणी’ का स्पष्ट मानना है कि चुनाव आयोग को अब सभी राजनीतिक दलों के लिए ‘हंसने और झेलने’ का एक अनिवार्य प्रशिक्षण शिविर आयोजित करना चाहिए। जो नेता बिना पुलिस को फोन किए अपने ऊपर बने कम से कम पांच कार्टूनों पर सामान्य रूप से मुस्कुरा सके, उसे ही चुनाव लड़ने का टिकट मिलना चाहिए। लेकिन अफसोस, आज का कड़वा सच यह है कि देश में महंगाई और बेरोजगारी भले ही रिकॉर्ड तोड़ दे, हमारे नेताओं का ब्लड प्रेशर सिर्फ एक कार्टूनिस्ट की कूची से बढ़ता है।

जनता को भी अब समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र में नेताओं पर हंसना एक ‘महंगा शौक’ बन चुका है। नेताजी चाहते हैं कि आप केवल उनके चुनावी वादों पर ही हंसें (वह भी मन ही मन), उनके चेहरों या बयानों पर नहीं। इसलिए, हंसना बंद कीजिए, देशहित में अपने सेंस ऑफ ह्यूमर का विसर्जन कीजिए और केवल वही ‘वाह-वाह’ कहिए जिसकी स्क्रिप्ट खुद नेताओं ने लिखकर दी है। आखिर, लोकतंत्र की लाज इसी में बची है कि हमारे कोमल हृदय नेता जी कभी नाराज न हों!


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कागा जी