‘बॉम्बे’ से ‘बॉलीवुड’ तक: क्या आपको पता है इस चमचमाती दुनिया का असली इतिहास?

हम हर शुक्रवार थियेटर की तरफ भागते हैं, पॉपकॉर्न चबाते हैं और अपने पसंदीदा सितारों की एंट्री पर सीटियां बजाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस ‘बॉलीवुड’ के हम इतने दीवाने हैं, उसका नाम कैसे पड़ा? विश्व प्रसिद्ध ‘एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ के पन्नों को पलटें, तो भारतीय सिनेमा का इतिहास किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं लगता। आइए, ‘काक-वाणी’ के इस खास लेख में जानते हैं हमारी अपनी फिल्म इंडस्ट्री का वह सफर, जिसने पूरी दुनिया को अपना दीवाना बना दिया।

आखिर कहां से आया यह ‘बॉलीवुड’ शब्द?

बहुत से लोग सोचते हैं कि बॉलीवुड हमेशा से ही इस इंडस्ट्री का नाम था, लेकिन ऐसा नहीं है। यह शब्द असल में 1970 के दशक में वजूद में आया। जब बॉम्बे (अब मुंबई) फिल्म इंडस्ट्री ने अमेरिकी ‘हॉलीवुड’ को टक्कर देना शुरू किया, तब बॉम्बे के ‘B’ और हॉलीवुड के ‘ollywood’ को मिलाकर एक नया शब्द बुना गया— ‘बॉलीवुड’। शुरुआत में कुछ निर्देशकों और लेखकों को यह नाम पसंद नहीं आया क्योंकि उन्हें लगा कि यह हॉलीवुड की सिर्फ एक सस्ती नकल है। लेकिन वक्त के साथ यह नाम ऐसा लोकप्रिय हुआ कि आज पूरी दुनिया इसे भारतीय सिनेमा का ब्रांड मानती है।

मूक फिल्मों से ‘टॉकीज’ का जादुई सफर

बॉलीवुड की शुरुआत आज जैसी रंगीन और भव्य नहीं थी। साल 1913 में दादा साहब फाल्के ने भारत की पहली मूक (silent) फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई थी। उस समय न तो फिल्मों में आवाज थी और न ही रंग, फिर भी दर्शकों में इसे लेकर गजब का उत्साह था। इसके बाद साल 1931 में आर्देशिर ईरानी ने देश को पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ दी। इस फिल्म के आते ही सिनेमाघरों में गानों और डायलॉग्स का ऐसा दौर शुरू हुआ, जो आज भी भारतीय फिल्मों की मुख्य ताकत बना हुआ है।

सिनेमा का ‘स्वर्ण युग’ और ग्लोबल पहचान

साल 1950 और 60 के दशक को भारतीय सिनेमा का ‘स्वर्ण युग’ (Golden Era) कहा जाता है। राज कपूर, गुरु दत्त, नर्गिस और दिलीप कुमार जैसे दिग्गजों ने इस दौरान ऐसी फिल्में बनाईं, जिन्होंने मनोरंजन के साथ-साथ समाज को एक नया आईना भी दिखाया। ‘आवारा’, ‘मदर इंडिया’ और ‘प्यासा’ जैसी फिल्मों ने न केवल भारत में बल्कि रूस, चीन और मध्य पूर्व के देशों में भी सफलता के झंडे गाड़े।

70 के दशक में ‘एंग्री यंग मैन’ अमिताभ बच्चन के उदय के साथ ‘मसाला’ फिल्मों का फॉर्मूला हिट हुआ। आज बॉलीवुड सिर्फ देश तक सीमित नहीं है, बल्कि ऑस्कर से लेकर कान्स फिल्म फेस्टिवल तक इसका डंका बज रहा है। तो दोस्तों, अगली बार जब आप थियेटर में फिल्म देखें, तो ‘काक-वाणी’ के इस सफरनामे को जरूर याद कीजिएगा!


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कागा जी